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Saturday, October 31, 2020

उपभोक्ता सन्तुलन

उपभोक्ता सन्तुलन

   Consumer's Equilibrium 

             जब कोई उपभोक्ता अपनी सीमित आय को व्यय करके अधिकतम संतुष्टि प्राप्त कर लेता है तो ऐसी स्थिति को उपभोक्ता संतुलन की स्थिति कहा जाता है। अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपभोक्ता कई प्रकार की वस्तुओं का उपभोग करता है और जब उसे ये वस्तुएं अपनी सीमित आय में आसानी से प्राप्त हो जाती हैं तो वह अधिकतम संतोष का अनुभव करता है अतः ये कह सकते हैं  कि उपभोक्ता संतुलन की स्थिति में है। ऐसी स्थिति में वह अपनी आय को खर्च करने के ढंग में कोई भी बदलाव नहीं करना चाहता। 

      उपयोगिता / तुष्टिगुण (Utility) 

 सामान्य बोलचाल की भाषा में उपयोगिता का अर्थ है लाभदायकता लेकिन अर्थशास्त्र में उपयोगिता शब्द का अर्थ है किसी वस्तु के उपभोग से मिलने वाली संतुष्टि अर्थात् तुष्टिगुण किसी वस्तु की वह शक्ति या विशेषता है जो किसी व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा करती है। उदाहरणार्थ खजूर में आवश्यकता पूर्ति का गुण है किन्तु मधुमेह के रोगी को डॉक्टर खजूर का सेवन न करने की सलाह देते हैं तो ऐसी स्थिति में खजूर में उस व्यक्ति के लिए कोई उपयोगिता नहीं है। 

प्रो. वाॅघ के शब्दों में " अर्थशास्त्री के लिए उपयोगिता आवश्यकताओं को संतुष्ट करने की क्षमता है।" 
            उपयोगिता एक मनोवैज्ञानिक धारणा है। अर्थशास्त्र की भाषा में जो पदार्थ किसी व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा करते हैं उनमें उपयोगिता होती है भले ही वह वस्तु हानिकारक हो। जैसे नशीले पदार्थ जो सामान्य रूप से उपयोगी नहीं होते  हैं लेकिन इन पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्ति के लिए इन पदार्थों में उपयोगिता होती है।  
  संक्षेप में, जब कोई वस्तु किसी मनुष्य की आवश्यकता को पूरा करती है  तो वह उसकी उपयोगिता कहलाती है। 
   उपयोगिता को utils के रूप में मापा जाता है । 

 उपयोगिता के मापन संबंधी अवधारणाएं / दृष्टिकोण 

1. गणनावाचक दृष्टिकोण     2. क्रमवाचक दृष्टिकोण 

1. गणनावाचक दृष्टिकोण (Cardinal Approach) -  प्रो. मार्शल एवं पीगू के अनुसार तुष्टिगुण को मुद्रा में मापा जा सकता है।  किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए दी जाने वाली क़ीमत ही तुष्टिगुण की माप है। अर्थात मुद्रा उपयोगिता का मापक है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति स्मार्ट फोन खरीदने के लिए 10,000/- खर्च करने के लिए तैयार है तो उस व्यक्ति के लिए स्मार्ट फोन का तुष्टिगुण 10,000/- के बराबर है ।
    तुष्टिगुण की माप इकाइयों द्वारा भी संभव है। इस विधि के अनुसार तुष्टिगुण को इकाईयों में व्यक्त किया जाता है मार्शल के अनुसार किसी वस्तु की उपयोगिता को संख्याओं; जैसे 1, 2 , 3 आदि में व्यक्त किया जा सकता है इनको एक दूसरे के आनुपातिक रूप में भी प्रकट कर सकते हैं जैसे 2 एक का दुगुना है और 3 एक का तीन गुना है।   
2. क्रमवाचक दृष्टिकोण (Ordinal Approach) -  
हिक्स, पैरेटो और एलेन आदि अर्थशास्त्रियों के अनुसार उपयोगिता को जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता है न ही इसे विभाजित किया जा सकता है क्योंकि उपयोगिता एक मनोवैज्ञानिक तथा व्यक्तिगत विचार है । ये अर्थशास्त्री प्रो. मार्शल के विचार से सहमत नहीं हैं। इनके अनुसार उपयोगिता स्थिर नहीं रहती और मुद्रा के मूल्य में भी बदलाव आते रहते हैं अतः उपयोगिता को मापने का कोई भी निश्चित पैमाना नहीं है। 
इन अर्थशास्त्रियों के अनुसार विभिन्न वस्तुओं से मिलने वाले तुष्टिगुण की हम तुलना कर सकते हैं और एक क्रम में रख सकते हैं लेकिन संख्या में माप नहीं सकते। उदाहरण के लिए - किसी उपभोक्ता को चाय की अपेक्षा काॅफी ज़्यादा पसंद है तो हम सिर्फ़ यह कह सकते हैं कि उपभोक्ता के लिए चाय की तुलना में काॅफी की उपयोगिता अधिक है। अर्थात उपभोग के क्रम में काॅफी का स्थान पहला है और चाय का दूसरा। यह कहना सही नहीं होगा कि चाय की उपयोगिता 40 है और काॅफी की उपयोगिता 80 है। न ही ये कहना ठीक है कि काॅफी
की उपयोगिता चाय से दुगुनी है। 
         निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि गणना वाचक दृष्टिकोण उपयोगिता को मापने का पुराना तरीक़ा है लेकिन अभी तक इसका महत्व कम नहीं हुआ है। हाँ आधुनिक अर्थशास्त्री इस अवधारणा को महत्व नहीं देते और इसके स्थान पर तटस्थता वक्र विश्लेषण का प्रयोग करते हैं। 

Thursday, October 29, 2020

Micro & Macro Economics

     व्यष्टि/सूक्ष्म अर्थशास्त्र 

     Micro Economics 

        माइक्रो शब्द ग्रीक भाषा के माइक्रोस शब्द से बना है जिसका अर्थ है छोटा, इस प्रकार Micro Economics छोटी इकाइयों से संबंधित है। 

      व्यष्टि अर्थशास्त्र में किसी अर्थव्यवस्था की विभिन्न छोटी - छोटी इकाइयों की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन या विश्लेषण किया जाता है। दूसरे शब्दों में सूक्ष्म अर्थशास्त्र के अंतर्गत विशेष व्यक्तियों, परिवार, उद्योगों और विशेष श्रमिक आदि का विश्लेषण किया जाता है। 


प्रो. बोलडिंग ने अपनी पुस्तक आर्थिक विश्लेषण में 

लिखा है कि " व्यष्टिगत अर्थशास्त्र के अंतर्गत विशेष फर्मों, विशेष परिवारों व्यक्तिगत क़ीमतों, मजदूरियों, आय आदि वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है।" 


हैंडर्सन क्वाण्ट के शब्दों में " व्यष्टिगत अर्थशास्त्र व्यक्तियों के सुपरिभाषित समूहों के आर्थिक कार्यो का अध्ययन है।" 

        इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि व्यष्टि अर्थशास्त्र का संबंध किसी एक इकाई से होता है सभी इकाइयों से नहीं। इसमें योगों का अध्ययन किया जाता है लेकिन ये योग सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था से संबंधित नहीं होते। 

          संक्षेप में कहा जा सकता है कि व्यष्टि या सूक्ष्म अर्थशास्त्र आर्थिक विश्लेषण की वह शाखा है जो अर्थव्यवस्था के छोटे भागों और उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करती है। कुछ अर्थशास्त्री इसे क़ीमत सिद्धांत का नाम देते हैं जिसके अंतर्गत माँग एवं पूर्ति द्वारा विभिन्न वस्तुओं के व्यक्तिगत मूल्य निर्धारित किए जाते हैं। 


         समष्टि  / वृहत  अर्थशास्त्र

                 Macro Economics 


सन् 1929-30 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की स्थिति और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के पूर्ण रोजगार के सिद्धान्त की असफलता के कारण प्रो. जे. एम. कीन्स ने ‘सामान्य सिद्धान्त’ की रचना की थी। प्रो. कीन्स के अनुसार- “राष्ट्रीय तथा विश्वव्यापी आर्थिक समस्याओं का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत किया जाना चाहिए।” इस प्रकार समष्टि अर्थशास्त्र में अर्थव्यवस्था का अध्ययन समग्र रूप से किया जाता है। उदाहरण के लिए, कुल राष्ट्रीय आय, कुल मागँ , कुल पूर्ति कुल बचत, कुल विनियोग, पूर्ण रोज़गार इत्याद। इसे कुल याेग संबधी अथवा सामूहिक अर्थशास्त्र भी कहते हैं ।


समष्टि अर्थशास्त्र में समस्त आर्थिक क्रियाओं का संपूर्ण रूप से अध्ययन किया जाता है। राष्ट्रीय आय, उत्पादन, रोज़गार/बेरोज़गारी, व्यापार चक्र, सामान्य क़ीमत स्तर, मुद्रा संकुचन, आर्थिक विकास, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, आदि आर्थिक क्रियाओं का विश्लेषण इसके अंतर्गत किया जाता है।




Tuesday, October 27, 2020

बाज़ार - परिभाषा एवं वर्गीकरण

       बाज़ार से तात्पर्य

       MEANING OF MARKET 

आम बोलचाल की भाषा में ऐसे स्थान को बाज़ार कहा जाता है जहाँ क्रेता (Buyer) और विक्रेता (Seller) एकत्र होकर वस्तुओं को खरीदते और बेचते हैं। बाज़ार को हाट या मंडी(Mart) भी कहा जाता है लेकिन अर्थशास्त्रियों की दृष्टि से बाज़ार का यह अर्थ संकुचित है क्योंकि वस्तुओं का क्रय - विक्रय तो डाक, टेलीफोन तथा इण्टरनेट के द्वारा भी किया जा सकता है। बाज़ार के लिए क्रेताओं और विक्रेताओं का भौतिक रूप से किसी एक स्थान पर उपस्थित होना ज़रूरी नहीं है।

अर्थशास्त्र में बाज़ार का अर्थ   

अर्थशास्त्र में बाज़ार शब्द का अर्थ अत्यन्त व्यापक हैअर्थशास्त्र में बाज़ार से तात्पर्य उस पूरे क्षेत्र से होता है जिसमें किसी वस्तु के क्रेता और विक्रेता फैले हुए हों और उनके बीच वस्तुओं को खरीदने और बेचने की स्वतंत्र प्रतियोगिता होती है, जिससे उस क्षेत्र में उस वस्तु की क़ीमत में एकरूपता पायी जाती है। 

बाज़ार की परिभाषा (Definitions of Market) 

चैपमैन के अनुसार  "यह आवश्यक नहीं कि बाज़ार शब्द किसी स्थान विशेष की ओर संकेत करे, बल्कि यह सदैव वस्तु या वस्तुओं तथा उनके क्रेताओं और विक्रेताओं की ओर संकेत करता है, जिनमें परस्पर प्रत्यक्ष प्रतियोगिता पायी जाती है।" 
एली के अनुसार, "बाज़ार का अर्थ हम उस क्षेत्र से लगाते हैं, जिसमें किसी वस्तु विशेष की क़ीमत का निर्धारण करने वाली शक्तियाँ कार्यशील होती हैं। "

 बाज़ार का वर्गीकरण (Classification of Market)

अर्थशास्त्रियों द्वारा कुछ प्रमुख आधारों पर बाज़ार का वर्गीकरण किया गया है जो इस प्रकार है - 
1. क्षेत्र के आधार पर 
i) स्थानीय बाज़ार         ii) प्रादेशिक (क्षेत्रीय) बाज़ार 
iii) राष्ट्रीय बाज़ार        iv) अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार 
2.समय के आधार पर 
i) दैनिक बाज़ार या अति अल्पकालीन बाज़ार 
ii) अल्पकालीन बाज़ार
iii) दीर्घकालीन बाज़ार
iv) अति दीर्घकालीन बाज़ार