उपभोक्ता सन्तुलन
Consumer's Equilibrium
जब कोई उपभोक्ता अपनी सीमित आय को व्यय करके अधिकतम संतुष्टि प्राप्त कर लेता है तो ऐसी स्थिति को उपभोक्ता संतुलन की स्थिति कहा जाता है। अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपभोक्ता कई प्रकार की वस्तुओं का उपभोग करता है और जब उसे ये वस्तुएं अपनी सीमित आय में आसानी से प्राप्त हो जाती हैं तो वह अधिकतम संतोष का अनुभव करता है अतः ये कह सकते हैं कि उपभोक्ता संतुलन की स्थिति में है। ऐसी स्थिति में वह अपनी आय को खर्च करने के ढंग में कोई भी बदलाव नहीं करना चाहता।
उपयोगिता / तुष्टिगुण (Utility)
सामान्य बोलचाल की भाषा में उपयोगिता का अर्थ है लाभदायकता लेकिन अर्थशास्त्र में उपयोगिता शब्द का अर्थ है किसी वस्तु के उपभोग से मिलने वाली संतुष्टि अर्थात् तुष्टिगुण किसी वस्तु की वह शक्ति या विशेषता है जो किसी व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा करती है। उदाहरणार्थ खजूर में आवश्यकता पूर्ति का गुण है किन्तु मधुमेह के रोगी को डॉक्टर खजूर का सेवन न करने की सलाह देते हैं तो ऐसी स्थिति में खजूर में उस व्यक्ति के लिए कोई उपयोगिता नहीं है।
प्रो. वाॅघ के शब्दों में " अर्थशास्त्री के लिए उपयोगिता आवश्यकताओं को संतुष्ट करने की क्षमता है।"
उपयोगिता एक मनोवैज्ञानिक धारणा है। अर्थशास्त्र की भाषा में जो पदार्थ किसी व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा करते हैं उनमें उपयोगिता होती है भले ही वह वस्तु हानिकारक हो। जैसे नशीले पदार्थ जो सामान्य रूप से उपयोगी नहीं होते हैं लेकिन इन पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्ति के लिए इन पदार्थों में उपयोगिता होती है।
संक्षेप में, जब कोई वस्तु किसी मनुष्य की आवश्यकता को पूरा करती है तो वह उसकी उपयोगिता कहलाती है।
उपयोगिता को utils के रूप में मापा जाता है ।
उपयोगिता के मापन संबंधी अवधारणाएं / दृष्टिकोण
1. गणनावाचक दृष्टिकोण 2. क्रमवाचक दृष्टिकोण
1. गणनावाचक दृष्टिकोण (Cardinal Approach) - प्रो. मार्शल एवं पीगू के अनुसार तुष्टिगुण को मुद्रा में मापा जा सकता है। किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए दी जाने वाली क़ीमत ही तुष्टिगुण की माप है। अर्थात मुद्रा उपयोगिता का मापक है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति स्मार्ट फोन खरीदने के लिए 10,000/- खर्च करने के लिए तैयार है तो उस व्यक्ति के लिए स्मार्ट फोन का तुष्टिगुण 10,000/- के बराबर है ।
तुष्टिगुण की माप इकाइयों द्वारा भी संभव है। इस विधि के अनुसार तुष्टिगुण को इकाईयों में व्यक्त किया जाता है मार्शल के अनुसार किसी वस्तु की उपयोगिता को संख्याओं; जैसे 1, 2 , 3 आदि में व्यक्त किया जा सकता है इनको एक दूसरे के आनुपातिक रूप में भी प्रकट कर सकते हैं जैसे 2 एक का दुगुना है और 3 एक का तीन गुना है।
2. क्रमवाचक दृष्टिकोण (Ordinal Approach) -
हिक्स, पैरेटो और एलेन आदि अर्थशास्त्रियों के अनुसार उपयोगिता को जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता है न ही इसे विभाजित किया जा सकता है क्योंकि उपयोगिता एक मनोवैज्ञानिक तथा व्यक्तिगत विचार है । ये अर्थशास्त्री प्रो. मार्शल के विचार से सहमत नहीं हैं। इनके अनुसार उपयोगिता स्थिर नहीं रहती और मुद्रा के मूल्य में भी बदलाव आते रहते हैं अतः उपयोगिता को मापने का कोई भी निश्चित पैमाना नहीं है।
इन अर्थशास्त्रियों के अनुसार विभिन्न वस्तुओं से मिलने वाले तुष्टिगुण की हम तुलना कर सकते हैं और एक क्रम में रख सकते हैं लेकिन संख्या में माप नहीं सकते। उदाहरण के लिए - किसी उपभोक्ता को चाय की अपेक्षा काॅफी ज़्यादा पसंद है तो हम सिर्फ़ यह कह सकते हैं कि उपभोक्ता के लिए चाय की तुलना में काॅफी की उपयोगिता अधिक है। अर्थात उपभोग के क्रम में काॅफी का स्थान पहला है और चाय का दूसरा। यह कहना सही नहीं होगा कि चाय की उपयोगिता 40 है और काॅफी की उपयोगिता 80 है। न ही ये कहना ठीक है कि काॅफी
की उपयोगिता चाय से दुगुनी है।
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि गणना वाचक दृष्टिकोण उपयोगिता को मापने का पुराना तरीक़ा है लेकिन अभी तक इसका महत्व कम नहीं हुआ है। हाँ आधुनिक अर्थशास्त्री इस अवधारणा को महत्व नहीं देते और इसके स्थान पर तटस्थता वक्र विश्लेषण का प्रयोग करते हैं।