आदर्श प्रतिस्पर्द्धा/पूर्ण प्रतियोगिता (Perfect Competition )
अर्थ एवं परिभाषा
आदर्श प्रतिस्पर्द्धा बाज़ार की वह स्थिति है जिसमें क्रेता Buyer और विक्रेता Seller दोनों असीमित संख्या में होते हैं इसलिए कोई भी एक विक्रेता Seller व्यक्तिगत रूप से बाज़ार में वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। इस बाज़ार में वस्तु की एक ही क़ीमत प्रचलित होती है। पूर्ण प्रतियोगिता बाज़ार की काल्पनिक स्थिति है वास्तविक नहीं।
प्रो. फगुर्सन के अनुसार, " एक उद्योग पूर्ण प्रतियोगिता वाला तब होता है, जब समस्त बाज़ार की तुलना में प्रत्येक क्रेता तथा विक्रेता इतना छोटा होता है कि वह अपनी ख़रीद अथवा उत्पादन में परिवर्तन करके बाज़ार क़ीमत को प्रभावित नहीं कर सकता है।"
प्रो. बोल्डिंग के अनुसार, " एक प्रतियोगी बाज़ार को ऐसे बाज़ार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसमें क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या अधिक हो, सब एक समान वस्तुओं के क्रय विक्रय में लगे हुए हों, जिनका एक-दूसरे से निकट सम्पर्क हो और जो स्वतंत्रतापूर्वक आपस में क्रय विक्रय करते हों।"
पूर्ण प्रतियोगिता के लक्षण/विशेषताएं
Characteristics of Perfection Competition
पूर्ण प्रतियोगिता बाज़ार के कुछ पूर्वानुमान/मान्यताएं हैं जो निम्नलिखित हैं –
i) क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या अत्याधिक या असीमित होती है।
ii) बाज़ार के सभी क्रेताओं को विक्रेताओं के बारे में और विक्रेताओं को क्रेताओं के बारे में पूर्ण ज्ञान होता है।
iii) प्रत्येक उत्पादक द्वारा बनाई गई वस्तु समान होती है।
iv) पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाज़ार में वस्तु का मूल्य भी समान होता है।
v) किसी नये उत्पादक के बाज़ार में आने पर या किसी उत्पादक के बाज़ार से निकलने पर कोई प्रतिबंध नहीं होता है।
vi) उत्पादन के सभी साधन गतिशील होते हैं।
vii) वस्तु की माँग पूर्णतः लोचदार होती है।
viii) पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाज़ार में क्रेता और विक्रेता पर कोई भी प्रतिबंध नहीं होता है । सरकारी नियंत्रण बाज़ार को प्रभावित नहीं करता है ।
ix) पूर्ण प्रतियोगी बाज़ार में औसत आय और सीमांत आय बराबर होती है क्योंकि बाज़ार में समान क़ीमत प्रचलित होती है एवं बिक्री बढ़ाने के लिए मूल्य को कम करने की आवश्यकता नहीं होती है।
बाज़ार सन्तुलन
(Market Equilibrium)
बाज़ार सन्तुलन का अर्थ है जब बाज़ार में सभी उपभोक्ता और फर्में पूरी तरह से संतुष्टि की स्थिति में होती हैं। फर्में किसी वस्तु की जितनी मात्रा की पूर्ति करना चाहती हैं वस्तु की उतनी ही मात्रा की मांग बाज़ार के उपभोक्ताओं द्वारा की जाती है। ऐसी स्थिति में बाज़ार में परिवर्तन की प्रवृत्ति नहीं होती है क्योंकि वस्तु की माँग और पूर्ति दोनों ही एक दूसरे के समान होते हैं।
संतुलन क़ीमत
( Equilibrium Price)
जिस बाज़ार मूल्य पर किसी वस्तु की माँग एवं उसकी पूर्ति दोनों की मात्रा समान होती है उसे संतुलन क़ीमत कहा जाता है। इसी क़ीमत पर बाज़ार संतुलन स्थापित होता है।
सन्तुलन मात्रा
(Quantity Equilibrium)
सन्तुलन क़ीमत पर मांगी जाने वाली और पूर्ति की जाने वाली वस्तु की इकाइयों की संख्या को सन्तुलन मात्रा कहा जाता है।
उदाहरण द्वारा संतुलन क़ीमत, सन्तुलन मात्रा और बाज़ार सन्तुलन का स्पष्टीकरण
अगर 400 ₹ की क़ीमत पर किसी वस्तु की 1000 इकाइयों की मांग की गई तथा पूर्ति भी 1000 इकाइयों की हुई तो तात्पर्य यह है कि बाज़ार सन्तुलन की अवस्था में है क्योंकि एक निश्चित मूल्य पर किसी वस्तु की माँग और पूर्ति समान है। इस उदाहरण में 400 ₹ संतुलन क़ीमत है और सन्तुलन मात्रा वस्तु की 1000 इकाईयां हैं।
सन्तुलन की मान्यताएँ
Assumptions of Equilibrium
सन्तुलन की निम्नलिखित तीन मान्यताएँ होती हैं -
1) माँग वक्र का ढाल ऋणात्मक होगा।
2) पूर्ति वक्र का ढाल धनात्मक होगा।
3) अगर माँग में वृद्धि पूर्ति से अधिक होती है तो क़ीमत भी बढ़ेगी। इसके विपरीत अगर माँग के बजाय पूर्ति ज़्यादा हो जाती है तो क़ीमत भी कम हो जाएगी।
बाज़ार सन्तुलन के निर्धारक
Determinants of Market Equilibrium
पूर्ण प्रतियोगी बाज़ार में किसी वस्तु की क़ीमत फ़र्मों और उपभोक्ताओं के मध्य प्रतियोगिता के द्वारा ही निर्धारित होती है ।विक्रेता अपनी वस्तु को अधिक से अधिक मूल्य पर बेचना चाहते हैं और कोशिश करते हैं कि सीमांत लागत से कम मूल्य पर वस्तु की बिक्री न हो। वहीं दूसरी तरफ उपभोक्ता किसी वस्तु को कम से कम मूल्य पर ख़रीदना चाहते हैं और एक उपभोक्ता किसी वस्तु के लिए जो ज़्यादा से ज़्यादा क़ीमत देने को तैयार हो जाता है वह वस्तु के सीमांत तुष्टिगुण के बराबर होती है।
प्रो. मार्शल ने माँग तथा पूर्ति की तुलना क़ैंची के दो फ़लकों से की है क्योंकि जहाँ पर माँग एवं वस्तु की पूर्ति दोनों बराबर होते हैं वहीं पर क़ीमत तय हो जाती है।
जब माँग के मुक़ाबले में पूर्ति ज़्यादा होती है तो यह स्थिति पूर्ति – आधिक्य कहलाती है और जब पूर्ति के मुक़ाबले में माँग ज़्यादा होती है तो यह स्थिति माँग – आधिक्य कहलाती है।
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| अधिपूर्ति की स्थिति |
रेखाचित्र में –DD बाज़ार माँग वक्र है।
SS बाज़ार पूर्ति वक्र है।
OP सन्तुलन क़ीमत है।
बाज़ार क़ीमत जब सन्तुलन से अधिक हो जाती है तो वस्तु की माँग भी कम हो जाती है लेकिन पूर्ति अधिक हो जाती है। S₁, S₂ पूर्ति आधिक्य की स्थिति है यही अतिरिक्त पूर्ति बाज़ार मूल्य को घटा कर सन्तुलन क़ीमत को दुबारा OP पर ले आएगी।
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| अधिमाँग की स्थिति |
रेखाचित्र में –DD बाज़ार माँग वक्र है।
SS बाज़ार पूर्ति वक्र है।
OP सन्तुलन क़ीमत है।
बाज़ार क़ीमत जब सन्तुलन से कम होती है तो माँग बढ़ने लगती है लेकिन पूर्ति कम हो जाती है। D₁ D₂ माँग आधिक्य की स्थिति है यही अतिरिक्त माँग बाज़ार क़ीमत को बढ़ा कर सन्तुलन क़ीमत को दुबारा OP पर ले आएगी।
माँग और पूर्ति में परिवर्तन का संतुलन क़ीमत पर असर
Effects on Equilibrium Price due to Change in Demand & Supply
किसी भी वस्तु की सन्तुलन क़ीमत हमेशा स्थिर नहीं रह सकती है क्योंकि कई अलग अलग कारणों से माँग एवं पूर्ति में परिवर्तन आते रहते हैं।
माँग में परिवर्तन का संतुलन क़ीमत तथा मात्रा पर प्रभाव
Effects of Change in
Demand on
Equilibrium Price
माँग में दो तरह के बदलाव आते हैं माँग का घटना या फिर माँग का बढ़ना और इन दोनों परिवर्तनों का संतुलन क़ीमत पर तभी प्रभाव पड़ सकता है जब पूर्ति में कोई बदलाव न आया हो।
माँग में वृद्धि का प्रभाव - कभी-कभी कुछ कारणों से वस्तु की माँग बढ़ जाती है जैसे – जनसंख्या वृद्धि एंव व्यक्ति की आय में वृद्धि आदि। ऐसी स्थिति में यदि वस्तु की पूर्ति स्थिर रहती है तो क़़ीमत बढ़ जाती है और मांग वक्र दाहिनी तरफ़ खिसक जाता है जो पूर्ति वक्र को एक नये एवं उच्च बिन्दुु पर काटता है। जैसा कि रेखाचित्र से स्पष्ट है –
चित्र में D₁D₁ पहला माँग वक्र है जो SS पूर्ति वक्र को E बिंदु पर काट रहा है यहाँ वस्तु की माँग OQ है और क़ीमत OP है जो कि सन्तुलन क़ीमत है। माँग बढ़ने पर माँग वक्र दाहिनी तरफ़ खिसक कर D₁D₁ हो गया है, माँग OQ₁ हो गई है और क़ीमत OP₁ हो गई है जो कि OP से अधिक है।
माँग में कमी का प्रभाव - कभी-कभी कुछ कारणों से वस्तु की माँग कम हो जाती है जैसे – व्यक्ति की आय का कम हो जाना। ऐसी स्थिति में यदि वस्तु की पूर्ति स्थिर रहती है तो मांग कम होने पर क़़ीमत भी कम हो जाती है और मांग वक्र बायीं तरफ़ खिसक जाता है जो पूर्ति वक्र को एक नये एवं निचले बिन्दुु पर काटता है। जैसा कि रेखाचित्र से स्पष्ट है –
चित्र में DD पहला माँग वक्र है जो SS पूर्ति वक्र को E बिंदु पर काट रहा है यहाँ वस्तु की माँग OQ है और क़ीमत OP है जो कि सन्तुलन क़ीमत है। माँग में कमी आ जाने पर माँग वक्र बायीं तरफ़ खिसक कर D₁D₁ हो गया है यहाँ वस्तु की माँग OQ से घट कर OQ₁ हो जाती है और क़ीमत OP से घट कर OP₁ हो गई है ।
पूर्ति में परिवर्तन का संतुलन क़ीमत तथा मात्रा पर प्रभाव
Effects of Change in Supply on Equilibrium Price
पूर्ति में दो तरह के बदलाव आते हैं पूर्ति का घट जाना या फिर पूर्ति का बढ़ जाना और इन दोनों परिवर्तनों का संतुलन क़ीमत पर तभी प्रभाव पड़ सकता है जब माँग में कोई बदलाव न आया हो।
पूर्ति में वृद्धि का प्रभाव - जब किसी कारण से वस्तु की पूर्ति में वृद्धि हो जाए जैसे किसी उद्योग में फर्मों की संख्या अधिक हो जाए या फसल अच्छी होने से।
ऐसी स्थिति में यदि मांग स्थिर रहती है तो क़ीमत घट जाती है और पूर्ति वक्र दाहिनी तरफ़ खिसक जाता है जोकि माँग वक्र को एक नए निचले बिंदु पर काटता है जैसा कि रेखाचित्र से स्पष्ट है –
चित्र में SS पहला पूर्ति वक्र है जो DD माँग वक्र को E बिंदु पर काट रहा है इस बिंदु पर संतुलन क़ीमत OP है और वस्तु की पूर्ति की मात्रा OQ है । पूर्ति बढ़ने पर पूर्ति वक्र दाहिनी तरफ़ खिसक कर S₁S₁ हो गया है जो DD माँग वक्र को एक नए बिंदु E₁ पर काट रहा है जहाँ पर वस्तु का मूल्य OP से घट कर OP₁ हो गया है और पूर्ति की मात्रा OQ से बढ़ कर OQ₁ हो गई है।
पूर्ति में कमी का प्रभाव - कभी कभी किसी कारणवश वस्तु की आपूर्ति कम हो जाती है जैसे उद्योग में लगी हुई फ़र्मों को कच्चा माल न मिल पाए और बाढ़ अथवा सूखा पड़ जानेे के कारण फसल ख़राब हो गई हो। ऐसी स्थिति में यदि वस्तु की माँग स्थिर रहती है तो पूर्ति के कम होने पर क़़ीमत बढ़ जाती है और पूर्ति वक्र बायीं तरफ़ खिसक जाता है जो मांग वक्र को एक नये एवं उच्च बिन्दुु पर काटता है। जैसा कि रेखाचित्र से स्पष्ट है –
चित्र में SS पहला पूर्ति वक्र है जो DD माँग वक्र को E बिंदु पर काट रहा है यहाँ वस्तु की पूर्ति OQ है और क़ीमत OP है जो कि सन्तुलन क़ीमत है। पूर्ति में कमी आ जाने पर पूर्ति वक्र बायीं तरफ़ खिसक कर S₁S₁ हो गया है यहाँ वस्तु की पूर्ति OQ से घट कर OQ₁ हो जाती है और क़ीमत OP से बढ़ कर OP₁ हो गई है।
NOTE : पूर्ति के बढ़ने पर पूर्ति वक्र दाहिनी ओर खिसक जाता है वहीं पूर्ति में कमी आने पर पूर्ति वक्र बायीं तरफ़ खिसकता है ।
माँग और पूर्ति में एक ही समय में वृद्धि का संतुलन क़ीमत पर प्रभाव
Effect of Simultaneous Increase in Demand & Supply on Equilibrium Price
वास्तव में किसी बाज़ार में अधिकतर तो माँग एवं पूर्ति दोनों में ही वृद्धि होती है। ऐसा होना कठिन है कि मांग और आपूर्ति में से एक स्थिर रहे। मांग और आपूर्ति में एक साथ वृद्धि होने पर संतुलन क़ीमत पर पड़ने वाले प्रभाव को इस प्रकार समझा जा सकता है —
माँग में वृद्धि = पूर्ति में वृद्धि - जब बाज़ार में वस्तु की माँग और उसकी पूर्ति दोनों में होने वाली वृद्धि समान हो तो संतुलन क़ीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। क़ीमत समान स्तर पर ही बनी रहेगी ।
रेखाचित्र में OX अक्ष पर माँग और पूर्ति की मात्रा को दिखाया गया है OY अक्ष पर क़ीमत को दिखाया गया है। DD शुरुआती माँग वक्र एवं SS शुरुआती पूर्ति वक्र हैं जो E बिंदु पर एक दूसरे को काट रहे हैं। E बिंदु पर क़ीमत OP है और वस्तु की मात्रा OQ है। जब माँग तथा पूर्ति में वृद्धि होती है तो नया माँग वक्र D₁D₁ और नया पूर्ति वक्र S₁S₁ बन गया है और ये दोनों वक्र एक दूसरे को नए संतुलन बिंदु E₁ पर काट रहे हैं। बिंदु E₁ पर वस्तु की मात्रा OQ₁ हो गई है लेकिन संतुलन क़ीमत OP ही है। स्पष्ट है कि माँग और पूर्ति में जब समान वृद्धि होती है तो क़ीमत पर पर कोई असर नहीं पड़ता है।
माँग में वृद्धि > पूर्ति में वृद्धि - जब वस्तु की पूर्ति के मुक़ाबलेे माँग ज़्यादा बढ़ती है
तो संतुलन क़ीमत में वृद्धि हो जाती है।
रेखाचित्र में OX अक्ष पर माँग और पूर्ति की मात्रा को दिखाया गया है OY अक्ष पर क़ीमत को दिखाया गया है। DD शुरुआती माँग वक्र एवं SS शुरुआती पूर्ति वक्र हैं जो E बिंदु पर एक दूसरे को काट रहे हैं। E बिंदु पर क़ीमत OP है और वस्तु की मात्रा OQ है। जब माँग तथा पूर्ति में वृद्धि होती है तो नया माँग वक्र D₁D₁ और नया पूर्ति वक्र S₁S₁ बन गया है और ये दोनों वक्र एक दूसरे को नए संतुलन बिंदु E₁ पर काट रहे हैं। बिंदु E₁ पर वस्तु की मात्रा OQ₁ हो गई है और वस्तु की क़ीमत OP से बढ़ कर OP₁ हो गई है स्पष्ट है कि मात्रा में ज़्यादा वृद्धि हुई है और क़ीमत में कम ।
माँग में वृद्धि < पूर्ति में वृद्धि - जब किसी वस्तु की पूर्ति माँग से ज़्यादा बढ़ जाती है तो संतुलन क़ीमत में कमी आ जाती है ।
रेखाचित्र में OX अक्ष पर माँग और पूर्ति की मात्रा को दिखाया गया है OY अक्ष पर क़ीमत को दिखाया गया है। DD शुरुआती माँग वक्र एवं SS शुरुआती पूर्ति वक्र हैं जो E बिंदु पर एक दूसरे को काट रहे हैं। E बिंदु पर क़ीमत OP है और वस्तु की मात्रा OQ है। जब माँग तथा पूर्ति में वृद्धि होती है तो नया माँग वक्र D₁D₁ और नया पूर्ति वक्र S₁S₁ बन गया है और ये दोनों वक्र एक दूसरे को नए संतुलन बिंदु E₁ पर काट रहे हैं। बिंदु E₁ पर वस्तु की मात्रा OQ₁ हो गई है और वस्तु की मात्रा OQ₁ हो गई है । वस्तु की क़ीमत OP से घट कर OP₁ हो गई है।
उच्चतम क़ीमत (Price Ceiling)
बाज़ार में किसी वस्तु की सन्तुलन क़ीमत का निर्धारण उसकी माँग एवं पूर्ति के द्वारा होता है। इसमें सरकारी हस्तक्षेप नहीं होता। कभी-कभी बाज़ार में वस्तु की कमी हो जाती है और इस कमी के कारण उस वस्तु की निर्धारित क़ीमत काफ़ी ऊँची हो जाती है।ऐसे में गरीब उपभोक्ता आवश्यक वस्तुओं को उनके ऊँचे मूल्य की वजह से ख़रीद नहीं पाते अतः उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए सरकार उस वस्तु की एक अधिकतम या उच्चतम क़ीमत तय कर देती है। यह उच्चतम क़ीमत संतुलन क़ीमत से कम होती है। कोई भी उत्पादक इस उच्चतम क़ीमत से अधिक मूल्य पर अपनी वस्तु को बेच नहीं सकता। भारत की सरकार उच्चतम क़ीमत ऐसी वस्तुओं के लिए तय करती है जिन्हें वह आम जनता के लिए आवश्यक या अनिवार्य समझती है। जैसे गेहूँ, चावल, चीनी तथा मिट्टी के तेल आदि की नियंत्रित क़ीमतें हैं । लगान नियंत्रण नीति भी इसका एक उदाहरण है। उच्चतम क़ीमत की नीति अपनाकर सरकार मांग को बढ़़ावा देना चाहती है लेकिन इससे काला बाज़ारी की समस्या भी सामने आ सकती है। काला बाज़ारी का अर्थ है कि एक विक्रेता ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से वस्तु की वह क़ीमत लेता है जो उच्चतम क़़ीमत से काफ़ी अधिक होती है।
न्यूनतम क़ीमत (Floor Price)
कभी-कभी बाज़ार में किसी वस्तु की
क़ीमत इतनी कम हो जाती है कि उत्पादक को उत्पादन लागत भी नहीं मिल पाती। कृषि के क्षेत्र में अक्सर ऐसा होता है। जब खाद्यान्नों की फसल काफ़ी अच्छी होती है तो बाज़ार में अचानक ही खाद्यान्नों की पूर्ति बढ़ जाती है जिससे उनकी निर्धारित क़ीमत अचानक ही गिरने लगती है और किसानों को बहुत नुक़सान का सामना करना पड़ता है । ऐसी स्थिति में सरकार खाद्यान्नों की एक न्यूनतम क़ीमत तय कर देती है जोकि सन्तुलन क़ीमत से अधिक होती है। इससे उत्पादकों और ख़ास तौर पर किसानों के हितों की रक्षा होती है क्योंकि कोई भी उत्पादक या किसान न्यूनतम क़ीमत से कम क़ीमत पर अपने उत्पाद को बेच नहीं सकता। इस तरह किसानों को उनके उत्पाद की एक निश्चित क़ीमत मिलती है।
इसी प्रकार भारतीय श्रम बाज़ार भी श्रम की अधिपूर्ति वाला बाज़ार है जहाँ माँग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा तय की गयी मज़दूरी की दर अक्सर बहुत कम होती है अतः मज़दूरों के हितों की रक्षा के लिए सरकार न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम लागू करती है।