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Wednesday, January 27, 2021

नज़रिया वो भी पराया

नज़रिया

अजीब सी बात है किसी का इस्तेमाल किया गया सामान हम इस्तेमाल नहीं करना चाहते... हर जगह, हर बात में, हर तरह से दूसरों से ख़ुद को अलग देखना पसंद करते हैं वो बात कहना पसंद नहीं करते जो पहले कई बार कही जा चुकी हो...यानि कुछ भी ऐसा जो पहले किसी और का रहा हो उसे अपना कहना हम गवारा ही करते, लेकिन ताज्जुब की बात है और अफ़सोस की भी कि हम दूसरों के नज़रिए को आख़िर क्यूँ अपना लेते हैं? क्यूँ किसी इन्सान को उसी नज़र से देखते हैं जिससे सब देखते हैं? क्यूँ किसी के बारे में कही गई बातों पर बड़ी आसानी से यक़ीन कर लेते हैं? क्यूँ किसी से मिले बग़ैर, जाने बिना ही उसे जानने की कोशिश करते हैं?  हम इतने नासमझ क्यूँ बन जाते हैं कि दूसरों की अक़्ल को अपनी अक़्ल से ज़्यादा समझ लेते हैं और उन्हें ख़ुद से ज़्यादा समझदार मान लेते हैं? जबकि बाक़ी मामलों में हम अपने आप को ही दुनिया का सबसे समझदार और तजुर्बेकार इंसान समझने की भूल कर जाते हैं. ! जी हाँ ये भूल ही तो है जो हम से बार बार होती है और हर बार हम को एक नया सबक़ सिखाती है फिर भी सीखना कौन चाहता है .! इतनी आदत हो गई है हमको दूसरों के नज़रिए को इस्तेमाल करने की...... कि हम किसी इंसान को या हालात को ख़ुद की नज़र से देखना ही नहीं चाहते वहीं दूसरी तरफ किसी इंसान के लिए हम जो राय क़ायम कर लेते हैं उसी पर क़ायम रहना चाहते हैं!!! ये वाक़ई ग़ौर करने की बात है और करना भी चाहिए नहीं तो हम कभी भी एक सही नज़रिया अपना नहीं पाएंगे। कहीं पर ग़लतफहमी का शिकार बने रहेंगे और कहीं झूठ के पर्दे के पीछे छुपे सच को पहचान नहीं पाएंगे। दोनों ही हालात में नुक़सान हमारा ही है, धोखा हम ही खाएंगे.... सही इन्सान को ग़लत समझ कर और दूसरों के ग़लत नज़रिए को सच मान कर .........!!! अब फैसला आपको ख़ुद करना होगा कि ग़लत फहमी में जीना है या सच को पहचानने की कोशिश करनी है। ज़िंदगी में ऐसे मौक़े बार बार आयेंगे और आपका इम्तेहान लेंगे इसलिए तैयारी अभी से शुरू कर दीजिए। 

एक मशहूर शायर का शेर याद आ रहा है जोकि पेश ए ख़िदमत है —
ले दे के अपने पास फ़क़त एक नज़र तो है 
क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम 
  










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