उत्पादन फलन Production Function
उत्पादन का उसके साधनों के साथ क्रियात्मक संबंध होता है यानि जब उत्पत्ति के कारकों में वृद्धि की जाती है तो परिणामस्वरूप उत्पादन में भी वृद्धि होती है एवं जब उत्पत्ति के कारकों में कमी की जाती है तो उत्पादन में भी कमी आती है। उत्पादन फलन उत्पादनों (Outputs) तथा उपादानों(Inputs) के मध्य फलनात्मक अथवा क्रियात्मक संबंध को दर्शाता है। उत्पादन फलन से ही हमें ये पता चलता है कि एक निश्चित समय में उत्पादन के साधनों में बदलाव लाकर उत्पादन के आकार में किस तरह और कितनी मात्रा में परिवर्तन होता है। इसे इस प्रकार लिखा जा सकता है
Q = f ( L,K)
यहाँ Q उत्पादन की मात्रा है
f फलन है जो यह बताता है कि उत्पादन की मात्रा L (श्रम) और K (पूँजी) पर निर्भर करती है। श्रम और पूँजी को उत्पादन का मुख्य कारक माना जाता है।
एक उत्पादन फलन जब दूसरे कारक (पूँजी) को स्थिर रख कर सिर्फ़ एक कारक (श्रम) में परिवर्तन के कारण उत्पादन में होने वाले परिवर्तन को बताता है तो यह अल्पकालीन उत्पादन फलन कहलाता है। अल्पकालीन उत्पादन फलन के सिद्धांत को परिवर्ती अनुपातों का नियम और कारक के प्रतिफल का नियम भी कहा जाता है क्योंकि अल्पकाल में केवल एक ही कारक (श्रम) को ही परिवर्तनशील साधन समझा जाता है अतः इसी में परिवर्तन के द्वारा उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन किया जाता है उत्पादन के पूरे पैमाने को बदला नहीं जा सकता है क्योंकि अल्पकाल में पूँजी को स्थिर साधन माना जाता है।
दीर्घकालीन उत्पादन फलन उत्पादन पर पड़ने वाले उस प्रभाव को बताता है जब उत्पत्ति के सभी कारकों को एक साथ और एक ही अनुपात में परिवर्तित किया जा सकता है।दीर्घकालीन उत्पादन फलन का सिद्धांत पैमाने के प्रतिफल का सिद्धांत कहलाता है क्योंकि दीर्घकाल में उत्पादन का कोई भी साधन स्थिर नहीं रहता अतः फर्म अपने उत्पादन के पैमाने में विस्तार भी कर सकती है और संकुचन भी।
अर्थात जब उत्पत्ति के सभी साधनों में एक निश्चित अनुपात में वृद्धि करके उत्पादन को बढ़ाया जाता है तो इसे दीर्घकालीन उत्पादन फलन कहते हैं।
अगर पूँजी की मात्रा को दुगुना किया गया है तो श्रम की मात्रा को भी दुगुना करना होगा अर्थात साधनों के परिवर्तन का अनुपात स्थिर रहता है। उदाहरण :
50x = f ( 2L, 4K )
500x = f ( 20L, 40K )
पहले उत्पादन फलन से स्पष्ट है कि x वस्तु की 50 इकाइयों के उत्पादन में श्रम की 2 तथा पूँजी की 4 इकाइयों का उपयोग हुआ है और दूसरा उत्पादन फलन बता रहा है कि उत्पादन की मात्रा में दस गुना वृद्धि के लिए श्रम और पूँजी की इकाईयों में दस - दस गुना वृद्धि की गई है अर्थात श्रम की इकाईयों को 2 से बढ़ाकर 20 किया गया है वहीं पूँजी की इकाईयों को 4 से बढ़ाकर 40 किया गया है। इसी तरह एक और उदाहरण है –
100x = f ( 10L, 5K )
1000x = f ( 50L, 25K )
यहाँ भी उत्पादन के साधनों की इकाईयों में पाँच - पाँच गुना वृद्धि की गई है जो कि समान अनुपात है और उत्पादन की मात्रा में दस गुना वृद्धि हुई है।
पैमाने के प्रतिफल
Returns to Scale
पैमाने के प्रतिफल से तात्पर्य उत्पादन में आने वाले उस बदलाव से है जो उत्पत्ति के सभी कारकों को समान अनुपात में परिवर्तित करने की वजह से आता है। उत्पत्ति के सभी कारकों में परिवर्तन सिर्फ़ दीर्घ काल में ही सम्भव है इसलिए पैमाने के प्रतिफल का संबंध दीर्घकालीन उत्पादन फलन से होता है।
पैमाने के प्रतिफल के विभिन्न नियम
Different Types of Returns to Scale
साधनों के अनुपात में होने वाले परिवर्तन से उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन की तुलना करने से पता चलता है कि उत्पादन में परिवर्तन किस अनुपात में हो रहा है। उत्पादन में परिवर्तन तीन प्रकार से हो सकता है –
उत्पादन के साधनों की इकाइयों में वृद्धि की अपेक्षा उत्पादन अधिक अनुपात में भी बढ़ सकता है, समान अनुपात में भी बढ़ सकता है और ये भी मुमकिन है कि उत्पादन के साधनों की इकाइयों में जितनी वृद्धि की जाये उसके मुक़ाबले में उत्पादन कम बढ़े।
उत्पादन तकनीक में सुधार, विशिष्टीकरण आदि के कारण उत्पादन में आन्तरिक एवं बाह्य बचत होती हैं लेकिन ये बचतें अस्थायी होती हैं जो कुछ समय बाद हानियों में बदल जाती हैं।
उत्पादन के आरंभिक दिनों में इन आन्तरिक एवं बाह्य बचतों की वजह से ही पैमाने के बढ़ते प्रतिफल(Increasing Returns to Scale ) प्राप्त होते हैं। जब ये बचतें हानि में बदल जाती हैं तो पैमाने के ह्रासमान अथवा घटते हुए प्रतिफल(Decreasing Returns to Scale ) प्राप्त होते हैं। इनके मध्य की अवस्था पैमाने के स्थिर या समान प्रतिफल(Constant Returns to Scale) की होती है।
स्पष्ट है कि पैमाने के प्रतिफल को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –
1) पैमाने के बढ़ते प्रतिफल (Increasing Returns to Scale )
2) पैमाने के स्थिर या समान प्रतिफल(Constant Returns to Scale)
3) पैमाने के ह्रासमान अथवा घटते हुए प्रतिफल(Decreasing Returns to Scale )
पैमाने के बढ़ते प्रतिफल
Increasing Returns to Scale
जब साधनों की निश्चित वृद्धि से क्रमश: अधिक उत्पादन प्राप्त होता है तो इसे पैमाने के बढ़ते प्रतिफल कहते
हैं। यदि उत्पादन के साधनों को 20% बढ़ाया जाए और उत्पादन 20% से ज़्यादा बढ़ जाए तो यह अवस्था पैमाने के बढ़ते प्रतिफल की है। इस तरह पैमाने के बढ़ते प्रतिफल में -
उत्पादन में आनुपातिक वृद्धि > साधनों की मात्रा में आनुपातिक वृद्धि
इस रेखाचित्र में समोत्पाद वक्र (Iso-Product Curve) IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ द्वारा पैमाने के बढ़ते प्रतिफल को दर्शाया गया है ये चारों वक्र उत्पादन में समान वृद्धि (100 इकाइयों) को दर्शा रहे हैं। OS रेेखा उत्पादन के पैमाने (scale) को दर्शा रही है। समोत्पाद वक्र IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ पैमाना रेखा OS को क्रमशः P, Q, R एवं T बिन्दु पर काट रहे हैं और इन सभी बिन्दुओं पर क्रमशः 100,200,300 तथा 400 इकाईयों का उत्पादन दर्शाया गया है।
रेखाचित्र में OP>PQ>QR>RT
अर्थात उत्पादन में समान वृद्धि (100 इकाइयों) के लिए दोनों साधनों A और B की क्रमशः कम मात्रा की आवश्यकता होगी। यही पैमाने के बढ़ते प्रतिफल का नियम है।
पैमाने के स्थिर या समान प्रतिफल
Constant Returns to Scale
इस नियम के अनुसार जिस अनुपात में उत्पत्ति के साधनों की मात्रा को बढ़ाया जाएगा उत्पादन में भी उसी अनुपात में वृद्धि होगी और जिस अनुपात में उत्पत्ति के साधनों की मात्रा में कमी होगी उत्पादन भी उसी अनुपात में घटेगा । यदि उत्पत्ति के साधनों को 40% बढ़ाया जाये और उत्पादन भी 40% ही बढ़े तो यह अवस्था पैमाने के स्थिर या समान प्रतिफल की है। इस तरह पैमाने के स्थिर प्रतिफल में -
उत्पादन में आनुपातिक वृद्धि = साधनों में आनुपातिक वृद्धि
इस रेखाचित्र में समोत्पाद वक्र (Iso-Product Curve) IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ द्वारा पैमाने के स्थिर प्रतिफल को दर्शाया गया है ये चारों वक्र उत्पादन में समान वृद्धि (100 इकाइयों) को दर्शा रहे हैं। OS रेेखा उत्पादन के पैमाने (scale) को दर्शा रही है। समोत्पाद वक्र IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ पैमाना रेखा OS को क्रमशः P, Q, R एवं T बिंदुओं पर समान टुकड़ों में बाँट रहे हैं और इन सभी बिन्दुओं पर क्रमशः 100,200,300 तथा 400 इकाईयों का उत्पादन दर्शाया गया है।
रेखाचित्र में OP=PQ=QR=RT
अर्थात उत्पादन में समान वृद्धि (100 इकाइयों) के लिए दोनों साधनों A और B की क्रमशः समान मात्रा की आवश्यकता होगी। यही पैमाने के स्थिर प्रतिफल का नियम है।
पैमाने के ह्रासमान या घटते हुए प्रतिफल
Decreasing Returns to Scale
इस नियम के अनुसार जिस अनुपात में उत्पत्ति के साधनों में वृद्धि होगी उत्पादन उससे कम अनुपात में बढ़ेगा । यदि साधनों को 20% बढ़ाया जाये और उत्पादन में 20% से कम वृद्धि हो तो यह अवस्था पैमाने के घटते प्रतिफल की है। अन्य शब्दों में, उत्पादन में समान वृद्धि के लिए साधनों की क्रमश: अधिकाधिक मात्रा की आवश्यकता होगी। इस तरह पैमाने के घटते प्रतिफल में -
उत्पादन में आनुपातिक वृद्धि < साधनों में आनुपातिक वृद्धि
इस रेखाचित्र में समोत्पाद वक्र (Iso-Product Curve) IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ द्वारा पैमाने के घटते प्रतिफल को दर्शाया गया है ये चारों वक्र उत्पादन में समान वृद्धि (100 इकाइयों) को दर्शा रहे हैं। OS रेेखा उत्पादन के पैमाने (scale) को दर्शा रही है। समोत्पाद वक्र IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ पैमाना रेखा OS को क्रमशः P, Q, R एवं T बिंदुओं पर काट रहे हैं और इन सभी बिन्दुओं पर क्रमशः 100,200,300 तथा 400 इकाईयों का उत्पादन दर्शाया गया है।
रेखाचित्र में PQ<QR<RT
अर्थात उत्पादन में समान वृद्धि (100 इकाइयों) के लिए दोनों साधनों A और B की क्रमशः अधिक मात्रा की आवश्यकता होगी। यही पैमाने के घटते प्रतिफल का नियम है।
पैमाने के प्रतिफल की तीन अवस्थाएँ ज़रूर होती हैं लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि पैमाने के तीनों प्रतिफल को दर्शाने के लिए अलग-अलग उत्पादन फलन की आवश्यकता होती है। अक्सर एक ही उत्पादन फलन पैमाने के प्रतिफल की तीनों अवस्थाओं की व्याख्या करता है।
जब एक फर्म अपने उत्पादन के पैमाने को बढ़ाती है तो पैमाने के बढ़ते प्रतिफल की अवस्था प्राप्त होती है फिर एक स्थिति पैमाने के स्थिर प्रतिफल की आती है और आख़िर में पैमाने के घटते प्रतिफल की अवस्था प्राप्त होती है। पैमाने पैमाने के प्रतिफल की तीनों अवस्थाओं को समोत्पाद वक्रों (IP curves) की मदद से एक ही रेखाचित्र में आसानी से समझा जा सकता है -
इस रेखाचित्र में OS पैमाने रेखा को तीन हिस्सों में बांट सकते हैं –
i) बिन्दु P से बिन्दु S तक
PQ > QR > RS
रेखा का ये भाग पैमाने के बढ़ते प्रतिफल को दिखा रहा है।
ii) बिन्दु S से बिन्दु K तक
ST = TK
रेखा का ये भाग पैमाने के स्थिर प्रतिफल को दिखा रहा है।
iii) बिन्दु K से बिन्दु V तक
KM < MN < NV
रेखा का ये भाग पैमाने के घटते प्रतिफल को दिखा रहा है।
पैमाने के प्रतिफल की मान्यताएं
पैमाने के प्रतिफल के संबंध में निम्नलिखित तथ्य अथवा मान्यताएं हैं –
1) ये दीर्घकालीन उत्पादन फलन पर आधारित होते हैं क्योंकि इसका संबंध दीर्घकालीन उत्पादन से होता है ।
2) पूर्ण प्रतियोगिता होती है। उत्पादन के सभी साधनों की इकाईयों को एक समान अनुपात में परिवर्तित किया जा सकता है।
3) वस्तु या उत्पादन को उसकी मात्रा द्वारा मापा जाता है मुद्रा में नहीं।
4) उत्पादन की तकनीक अर्थात प्रौद्योगिकी में कोई भी परिवर्तन नहीं आता है ।




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