पूर्ति का नियम
LAW OF SUPPLY
पूर्ति का नियम वस्तु की क़ीमत और उसकी पूर्ति के बीच धनात्मक संबंध(positive relation) को दर्शाता है। यदि अन्य बातें समान रहें तो वस्तु का मूल्य बढ़ने के साथ ही उसकी पूर्ति भी बढ़ा दी जाती है और वस्तु का मूल्य कम हो जाने पर उसकी पूर्ति भी घट जाती है। इस तरह किसी वस्तु के मूल्य एवं उसकी पूर्ति में सीधा संबंध होता है । ध्यान रहे कि पूर्ति का नियम केवल पूर्ति की मात्रा में आने वाले परिवर्तनों की दिशा की तरफ संकेत करता है ।
सूत्र के रूप में इसे इस तरह व्यक्त किया जा सकता है –
S = f ( p)
यहां :
s = वस्तु की पूर्ति
p = वस्तु की क़ीमत
f = फलनात्मक सम्बन्ध
पूर्ति के नियम की मान्यताएं
Assumptions of Law of Supply
1) वस्तु विशेष के उत्पादन साधनों की क़ीमत एवं पूर्ति दोनों स्थिर रहनी चाहिए।
2) फ़र्म के उद्देश्य में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
3) वस्तु की उत्पादन तकनीक में कोई बदलाव नहीं आना चाहिए।
4) संबंधित वस्तुओं के मूल्यों में परिवर्तन नहीं होना चाहिए ।
5) क्रेता एवं विक्रेता की रुचि में कोई बदलाव नहीं आना चाहिए।
6) सरकारी नीतियों जैसे कर आदि में परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
तालिका एवं रेखाचित्र द्वारा पूर्ति के नियम का स्पष्टीकरण
उपरोक्त रेखाचित्र में पूर्ति वक्र बायें से दायें ऊपर की तरफ उठ रहा है जोकि वस्तु की मात्रा और उसके मूल्य के मध्य धनात्मक संबंध को व्यक्त कर रहा है। वक्र से स्पष्ट है कि मूल्य में वृद्धि होने पर वस्तु की पूर्ति की मात्रा भी बढ़ रही है।
पूर्ति के नियम के अपवाद
Exceptions of the Law of Supply
कुछ वस्तुओं पर पूर्ति का नियम लागू नहीं होता है इसका अर्थ यह है कि वस्तु का मूल्य बढ़ जाने पर भी उसकी पूर्ति की मात्रा नहीं बढ़ती । इसी तरह वस्तु का मूल्य घटने पर उसकी पूर्ति की मात्रा में कमी नहीं आती है। ऐसी वस्तुएँ निम्नलिखित हैं –
1)कृषि उत्पाद (Agricultural Goods)– कृषि उत्पाद प्राकृतिक कारणों से प्रभावित होते हैं यदि इन वस्तुओं की क़ीमत बढ़ जाए तो भी पूर्ति बढ़ाना सम्भव नहीं होता है। अगर मौसम ख़राब हो जाने के कारण फसल का नुक़सान हो गया हो तो ऐसी स्थिति में भी पूूर्ति की मात्रा को बढ़ाया नहीं जा सकता है इसलिए कृषि उत्पादों पर पूर्ति का नियम लागू नहीं होता है।
2) नाशवान वस्तुएं ( Perishable Goods) – जिन वस्तुओं को ज़्यादा दिनों तक नहीं रखा जा सकता यानि जो वस्तुएंं जल्दी ख़राब हो जाती हैं उन्हें विक्रेता कम मूल्य पर भी बेचना चाहते हैं। फल, सब्ज़ी और दूध आदि ऐसी ही वस्तुएंं हैं जिनके मूल्य में बदलाव आने पर भी उनकी पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन नहीं होता है।
3) दुर्लभ वस्तुएंं( Antique Goods) – एंटीक वस्तुुओं की पूर्ति सीमित होती है क्योंकि यह वस्तुएं काफ़ी कम मात्रा में उपलब्ध हैं। इन वस्तुुओं के मूल्य बहुत अधिक होते हैं फिर भी इनकी पूर्ति की मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
पूर्ति वक्र में संचलन / पूर्ति की गयी मात्रा में बदलाव
Movement Along the Supply Curve
जब किसी वस्तु की पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन उस वस्तु के मूल्य में बदलाव आने के कारण होता है तो इसे पूर्ति वक्र में संचलन कहते हैं पूर्ति वक्र में संचलन की स्थिति में अन्य बातें समान रहती हैं अर्थात पूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य कारक अपरिवर्तित रहते हैं। संचलन में पूर्ति वक्र अपने स्थान पर ही रहता है उसी पर मूल्य के अनुसार पूर्ति की मात्रा ऊपर नीचे खिसक जाती है। ये संचलन दो प्रकार का हो सकता है- विस्तार (Expansion) एवं संकुचन (Contraction)
1) पूर्ति का विस्तार (Expansion of Supply) – जब किसी वस्तु का मूूल्य बढ़ने के साथ ही उसकी पूर्ति की मात्रा में भी वृद्धि हो जाती है तो यह पूर्ति का विस्तार है। इसमें पूर्ति वक्र पर दाहिनी तरफ (rightward) संचलन होता है।
रेखाचित्र में OX अक्ष पर वस्तु की पूर्ति को तथा OY अक्ष पर वस्तु की क़ीमत को दिखाया गया है। SS पूर्ति वक्र है। रेखाचित्र से स्पष्ट है कि जब वस्तु का मूल्य OP है तो वस्तु की पूर्ति OQ है। जब वस्तु का मूल्य बढ़कर OP₁ हुआ तो उसकी पूर्ति भी OQ से बढ़कर OQ₁ हो गयी है। E से E₁ तक या Q से Q₁ तक पूर्ति की मात्रा में वृद्धि है और यही पूर्ति का विस्तार है।
2) पूर्ति का संकुचन (Contraction of Supply) – जब वस्तु की क़ीमत कम हो जाने पर उसकी पूर्ति की मात्रा में भी कमी आ जाती है तो यह पूर्ति का संकुचन है। इसमें पूर्ति वक्र पर बांयी तरफ (Leftward) संचलन होता है।
रेखाचित्र में OX अक्ष पर वस्तु की पूर्ति को तथा OY अक्ष पर वस्तु की क़ीमत को दिखाया गया है। SS पूर्ति वक्र है। रेखाचित्र से स्पष्ट है कि जब वस्तु का मूल्य OP है तो वस्तु की पूर्ति OQ है। जब वस्तु का मूल्य घटकर OP₁ हुआ तो उसकी पूर्ति भी OQ से घटकर OQ₁ हो गयी है। E से E₁ तक या Q से Q₁ तक पूर्ति की मात्रा में कमी है और यही पूर्ति का संकुचन है।
पूर्ति वक्र में खिसकाव/पूर्ति में बदलाव
Shift in Supply Curve
जब किसी वस्तु का मूल्य स्थिर रहे फिर भी उस वस्तु की पूर्ति में कमी आ जाए या पूर्ति में वृद्धि हो जाये तो इसे पूर्ति वक्र में खिसकाव की स्थिति कहा जाता है। पूर्ति वक्र में खिसकाव अन्य कारकों में बदलाव आने के कारण होता है। इस अवस्था में पूर्ति वक्र अपने स्थान से बायीं या दाहिनी तरफ खिसक जाता है। यदि पूर्ति में वृद्धि होती है तो पूर्ति वक्र दाहिनी तरफ खिसक जाता है और अगर पूर्ति में कमी आती है तो पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जाता है।
जिन कारकों की वजह से पूर्ति वक्र में बदलाव आता है वह निम्नलिखित हैं –
1) संबंधित वस्तुओं की क़ीमत
2) तकनीकी स्तर
3) उत्पादन लागत
4) सरकारी कर प्रणाली
5) उद्योग में फ़र्मों की संख्या
6) फ़र्मों का उद्देश्य आदि
यही कारक हैं जिनसे पूर्ति में बदलाव आता है और एक नया पूर्ति वक्र बन जाता है। पूर्ति में बदलाव की दो स्थितियां होती हैं पूर्ति में वृद्धि एवं पूर्ति में कमी।
1) पूर्ति में वृद्धि ( Increase in Supply) – जब वस्तु का मूल्य न बदले लेकिन वस्तु की पूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य घटकों में परिवर्तन आया हो और इस परिवर्तन से वस्तु की पूर्ति बढ़ जाये तो इसे पूर्ति में वृद्धि कहा जाता है।पूर्ति में वृद्धि के निम्नलिखित कारक हैं –
i) वैकल्पिक या स्थानापन्न वस्तु के मूल्य में गिरावट
ii) पूरक वस्तु के मूल्य में वृद्धि
iii) उत्पत्ति के साधनों के मूल्य में कमी
iv) उत्पादन की तकनीक में सुधार
v) उद्योग में फ़र्मों की संख्या में वृद्धि
vi) सरकारी कर नीति में बदलाव। यदि कर का मूल्य कम हो जाये और सरकारी अनुदान में वृद्धि हो जाये।
vii) उत्पादक के उद्देश्य में परिवर्तन। यदि वह अधिकतम लाभ के बजाय अधिकतम विक्रय का उद्देश्य अपना ले।
पूर्ति में वृद्धि का रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
रेखाचित्र से स्पष्ट है कि वस्तु के मूल्य में कोई बदलाव नहीं आया है लेकिन पूर्ति 100 से बढ़कर 150 इकाइयों पर पहुंच गई है। पूर्ति वक्र SS से S₁S₁ पर शिफ्ट हो गया है अर्थात अपने स्थान से दाहिनी तरफ (rightward) खिसक गया है।
2) पूर्ति में कमी (Decrease
in Supply) –जब वस्तु का मूल्य न बदले लेकिन वस्तु की पूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य घटकों में परिवर्तन आया हो और इस परिवर्तन से वस्तु की पूर्ति कम हो जाये तो इसे पूर्ति में कमी कहा जाता है। पूर्ति में कमी के निम्नलिखित कारक हैं –
i) ) वैकल्पिक या स्थानापन्न वस्तु के मूल्य में वृद्धि
ii) पूरक वस्तु के मूल्य में कमी
iii) उत्पत्ति के साधनों के मूल्य में वृद्धि
iv) उत्पादन की तकनीक में गिरावट
v) उद्योग में फ़र्मों की संख्या में कमी
vi) सरकारी कर नीति में बदलाव। यदि कर का मूल्य बढ़ जाये और सरकारी अनुदान में कमी आई हो।
vii) उत्पादक के उद्देश्य में परिवर्तन। यदि वह अधिकतम विक्रय के बजाय अधिकतम लाभ का उद्देश्य अपना ले।
पूर्ति में कमी का रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
रेखाचित्र से स्पष्ट है कि वस्तु के मूल्य में कोई बदलाव नहीं आया है लेकिन पूर्ति 150 से घटकर 100 इकाइयों पर पहुंच गई है। पूर्ति वक्र SS से S₁S₁ पर शिफ्ट हो गया है अर्थात अपने स्थान से बायीं तरफ (leftward) खिसक गया है।






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