उत्पादन लागत का एवं लागत फलन का अर्थ
Meaning of Production Cost & Cost Function
किसी भी फर्म या उत्पादक को अपने उत्पादन कार्य के लिए अलग-अलग उत्पत्ति के साधन एकत्रित करने पड़ते हैं और इनके प्रयोग के बदले में जो धनराशि व्यय करनी पड़ती है उसी को उत्पादन लागत कहा जाता है। उत्पादन लागत उत्पादन की मात्रा पर निर्भर करती है।
प्रो. मार्शल – "उत्पादन लागत वह समस्त मौद्रिक लागत है जो उद्यमी को अपने व्यवसाय में उत्पादन के विभिन्न साधनों को आकर्षित करने के लिए लगानी पड़ती है। इसमें कच्चे माल की क़ीमत, मज़दूरी और वेतन, पूँजी पर ब्याज, लगान, प्रबंध संबंधी सामान्य आय, करों का भुगतान तथा अन्य व्यापारिक कार्य आदि सम्मिलित होते हैं। "
उम्बेरेट, हण्ट तथा किण्टर – " उत्पादन लागत में वे समस्त भुगतान सम्मिलित होते हैं, जो कि अन्य व्यक्तियों को उनकी वस्तुओं और सेवाओं के उपयोग के बदले किए जाते हैं। इसमें मूल्य ह्रास तथा अप्रचलन जैसी मदें भी शामिल रहती हैं। इसमें उत्पादक द्वारा प्रदत्त सेवाओं के लिए अनुमानित मज़दूरी तथा उसके द्वारा प्रदत्त भूमि एवं पूँजी का पुरस्कार भी सम्मिलित रहता है।"
उत्पादन लागत = लगान + कच्चे माल का मूल्य + मज़दूरी + ब्याज + वेतन + मूल्य ह्रास + बीमा व्यय + सामान्य लाभ
लागत फलन (Cost Function)
लागत फलन उत्पादन और उत्पादन लागत के बीच संबंध को बताता है –
C = f(Q)
C = लागत
Q = उत्पादन
उत्पादन लागत का वर्गीकरण
Classification of Production Cost
उत्पादन लागत को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है —
I) A- मौद्रिक लागत B- वास्तविक लागत
C- अवसर लागत
II) A- स्थिर लागत B- परिवर्तनशील लागत
III) A- कुल लागत B- औसत लागत
C- सीमांत लागत
मौद्रिक, वास्तविक एवं अवसर लागत
Monetary, Real & Opportunity Cost
1) A- मौद्रिक या द्राव्यिक लागत(Monetary Cost)
मुद्रा की वह मात्रा जो किसी वस्तु के उत्पादन में व्यय होती हैै, मौद्रिक लागत (Monetary Cost) कहलाती है। इसमें उत्पादन के सभी साधनों पर किया जाने वाला
व्यय शामिल होता है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार मौद्रिक लागत में तीन तरह की मदें शामिल होती हैं —
i) स्पष्ट लागत (Explicit Costs) – ऐसे सभी व्यय जिनका भुगतान उत्पादन प्रक्रिया के दौरान किया जाता है उन्हें स्पष्ट लागत कहते हैं जैसे -
* कच्चे माल पर व्यय
* श्रम की मज़दूरी या वेतन
* पूँजी पर दिया जाने वाला ब्याज
* भूमि का लगान या बिल्डिंग का किराया
* मशीनों की टूट-फूट एवं घिसावट
* विज्ञापन व्यय
* बीमा की क़िस्तों पर व्यय
ii) अस्पष्ट लागत (Implicit Costs) –इसमें उन
सेवाओं और साधनों की क़ीमतेंं शामिल होती हैं जिनका प्रयोग उत्पादक करता तो है लेकिन प्रत्यक्ष रुप में उसका मूल्य नहीं चुकाता जैसे -
* उद्यमी की स्वयं की पूँजी का ब्याज
* उद्यमी की स्वयं की भूमि का लगान या उसकी अपनी इमारत का किराया जिसका उत्पादन में उपयोग किया जाता है।
* उत्पादक की स्वयं की सेवा का वेतन
iii) सामान्य लाभ ( Normal Profit) – उत्पादक को उत्पादन जारी रखने के लिए जिस न्यूनतम लाभ की आवश्यकता होती है उसे ही सामान्य लाभ कहते हैं। अगर ये धनराशि उत्पादक को प्राप्त नहीं होगी तो वह उत्पादन का कार्य बन्द कर देगा।
i)B- वास्तविक लागत ( Real Cost) - किसी वस्तु के उत्पादन में जितने कष्ट उठाने पड़ते हैं, जितने त्याग करने पड़ते हैं और जो प्रयत्न किये जाते हैं उन सभी को वास्तविक लागत में शामिल किया जाता है। जैसे -
* श्रमिक को परिश्रम के रूप में कष्ट उठाने पड़ते हैं।
* पूँजीपति को उपभोग, त्याग और प्रतीक्षा के रूप में कष्ट उठाने पड़ते हैं।
ये सभी कष्ट और त्याग मिलकर वास्तविक लागत बन जाते हैं। वास्तविक लागत को सामाजिक लागत भी कहा जाता है। अर्थात वास्तविक लागत का तात्पर्य है किसी सेवा या वस्तु के उत्पादन में किए गए वास्तविक खर्चों का योग जैसे - कच्चे माल को खरीदने के लिए खर्च किया जाने वाला धन, श्रमिकों की मज़दूरी और पूंजीपति को दिया जाने वाला ब्याज आदि।
वास्तविक लागत का विचार मनोवैज्ञानिक और काल्पनिक है क्योंकि कष्ट, त्याग और प्रयास आदि केवल अनुभव किए जा सकते हैं लेकिन इनका मूल्य मुद्रा में मापा नहीं जा सकता है।
i) C - अवसर लागत (Opportunity Cost) - वास्तविक लागत को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे - वैकल्पिक लागत, विस्थापित लागत और हस्तांतरण आय आदि। अर्थशास्त्रियों के अनुसार उत्पत्ति के साधन सीमित होते हैं और उनके वैकल्पिक प्रयोग होते हैं । बेन्हम का कथन है कि मुद्रा की वह मात्रा जो साधन की कोई इकाई अपने सर्वश्रेष्ठ वैकल्पिक प्रयोग से प्राप्त कर सकती है, अवसर लागत कहलाती है।
अवसर लागत को एक उदाहरण के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है यदि कोई मज़दूर एक दिन में 400 रुपये कमाता है और वही मज़दूर कुछ दूसरे कार्य करके क्रमशः 600 रुपये और 800 रुपए तक कमा सकता है तो ऐसी स्थिति में जिस कार्य से उसे 800 रुपए प्राप्त हो सकते हैं वही उस मज़दूर के लिए सर्वश्रेष्ठ विकल्प होगा और यही 800 रुपए उस मज़दूर की अवसर लागत हुई।
स्थित एवं परिवर्तनशील लागत
Fixed & Variable Cost
ii) A- स्थिर लागत (Fixed Cost) - कुल लागत का वह भाग जो उत्पादन के स्थिर साधनों पर व्यय किया जाता है उसे स्थिर लागत कहा जाता है। चूँकि अल्पकालीन उत्पादन में कुछ साधनों की मात्रा में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है इसलिए ऐसे साधनों की लागत भी स्थिर रहती है। स्थिर लागत को परोक्ष लागत, उपरिव्यय और अपरिवर्तनशील लागत भी कहा जाता है। ये उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन होने पर भी परिवर्तित नहीं होती। यदि उत्पादन शून्य हो जायेे तो भी स्थिर लागत एक उत्पादक को वहन करनी होती है। जैसे भूमि और भवन आदि का किराया।
ii) B- परिवर्तनशील या प्रमुख लागत ( Variable or Prime Cost) - परिवर्तनशील लागत को प्रत्यक्ष और प्रमुख लागत भी कहा जाता है क्योंकि किसी भी फर्म के उत्पादन की मात्रा प्रत्यक्ष रुप से इन लागतों पर ही निर्भर करती है। उत्पादन बढ़नेे और घटने पर परिवर्तनशील लागत भी बढ़ती या घटती है। उदाहरण केे लिए जब एक फर्म उत्पादन की मात्रा को बढ़ाती है तो श्रम, कच्चा माल, परिवहन, बिजली और अन्य सामग्री पर किया जाने वाला व्यय भी बढ़ जाता है और इस तरह परिवर्तनशील लागत भी बढ़ जाती है। उत्पादन स्तर शून्य होने पर परिवर्तनशील लागत भी शून्य हो जाती है।
स्थिर लागत एवं परिवर्तनशील लागत का तालिका और रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शन
तालिका से स्पष्ट है कि जब उत्पादन शून्य है तो भी स्थिर लागत 200 है।उत्पादन बढ़ने पर भी स्थिर लागत 200 ही है जबकि परिवर्तनशील लागत और कुल लागत में वृद्धि हुई है। कुल लागत स्थिर लागत और परिवर्तनशील लागत का योग होती है।
रेखाचित्र में Xअक्ष पर उत्पादन की मात्रा और Yअक्ष पर लागत को दिखाया गया है स्थिर लागत को FC और परिवर्तनशील लागत को VC से दिखाया गया है।
कुल, औसत एवं सीमांत लागत (Total, Average & Marginal Cost)
iii) A- कुल लागत (Total Cost) - किसी वस्तु के उत्पादन में होने वाले विभिन्न प्रकार के व्ययों का योग कुल लागत कहलाता है। मुद्रा के रुप में किये गये सभी खर्चों को कुल लागत में शामिल किया जाता है। कुल लागत उत्पादन की मात्रा मेंं वृृद्धि के साथ-साथ बढ़ती रहती है। कुल लागत स्थिर लागत और परिवर्तनशील लागत का योग होती है।
कुल लागत = कुल स्थिर लागत + कुल परिवर्तनशील लागत
TC = TFC + TVC
स्थिर लागत और परिवर्तनशील लागत केवल अल्पकाल में पायी जाती हैं। दीर्घकाल में सभी लागतें परिवर्तनशील होती हैं।
iii) B - औसत लागत ( Average Cost) - कुल लागत को कुल उत्पादित इकाईयों से भाग देकर औसत लागत को प्राप्त किया जाता है। इसे प्रति इकाई लागत भी कहा जाता है।
अल्पकाल में औसत लागत औसत स्थिर लागत और औसत परिवर्तनशील लागत में बँटी होती है।
औसत स्थिर लागत (Average Fixed Cost)-
औसत स्थिर लागत या AFC का मतलब है उत्पादित हर एक इकाई पर स्थिर लागत। यदि एक हजार इकाइयों का उत्पादन होता है और कुल स्थिर लागत 1000 रूपये है तो फिर औसत स्थिर लागत 1 रूपए होगी।
औसत स्थिर लागत सूत्र :
औसत परिवर्तनशील लागत (Average Variable Cost) - जब कुल परिवर्तनशील लागत में उत्पादित इकाईयों की कुल मात्रा से भाग दिया जाता है तो औसत परिवर्तनशील लागत ज्ञात होती हैै।
औसत परिवर्तनशील लागत का सूत्र :
उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन के साथ ही औसत परिवर्तनशील लागत भी परिवर्तित हो जाती है
iii) C - सीमांत लागत (Marginal Cost) - वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करने से कुल लागत में जो वृद्धि होती है उसे उस इकाई विशेष की सीमांत लागत कहते हैं। दूसरे शब्दों में, किसी वस्तु की अंतिम इकाई के उत्पादन पर आने वाली लागत को सीमांत लागत कहा जाता है।
सीमांत लागत का सूत्र :
MC = TCₙ - TCₙ - 1
या
MC = TVCₙ - TVCₙ - 1
माना कि किसी वस्तु की 30 इकाइयों का उत्पादन किया जाता है और और इनकी कुल लागत 640 रुपये है अब अगर 31वीं इकाई का उत्पादन किया जाये और कुल लागत 640 रुपये से बढ़कर 700 रुपये हो जाती है तो वस्तु की 31वीं इकाई की सीमांत लागत 60 रुपये हुई।
कुल लागत, औसत लागत तथा सीमांत लागत का रेखा चित्र द्वारा प्रदर्शन
इस रेखाचित्र में X अक्ष पर उत्पादन की मात्रा तथा Y अक्ष पर लागत को दर्शाया गया है। कुल लागत को TC से और सीमांत लागत को MC से तथा औसत लागत को AC से दर्शाया गया है। कुल लागत उत्पादन में वृद्धि के साथ लगातार बढ़ती जा रही है जबकि सीमांत लागत पहले कम होती है बाद में एक बिन्दु के बाद बढ़ती है। लगभग यही प्रक्रिया औसत लागत के सम्बंध में भी होती है।