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Monday, December 14, 2020

उत्पत्ति ह्रास नियम LAW OF DIMINISHING RETURNS




 ह्रासमान प्रतिफल नियम अथवा क्रमागत उत्पत्ति ह्रास नियम LAW OF DIMINISHING RETURNS

                              अथवा 

परिवर्तनशील अनुपातों का नियम LAW OF VARIABLE PROPORTIONS

उत्पत्ति ह्रास नियम अल्पकालीन उत्पादन फलन का तीसरा नियम है लेकिन आधुनिक अर्थशास्त्री उत्पत्ति के तीनों नियमों को एक ही नियम कहते हैं और इसीलिये इस नियम को परिवर्तनशील अनुपातों का नियम (LAW OF VARIABLE PROPORTIONS) नाम दिया गया है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार मूल रूप से उत्पत्ति का एक ही नियम है और वह है उत्पत्ति ह्रास नियम। उत्पत्ति वृद्धि नियम एवं उत्पत्ति समता नियम सिर्फ़ उत्पत्ति ह्रास नियम की दो अवस्थाएँ हैं। 
उत्पत्ति ह्रास नियम तब लागू होता है जब परिवर्तनशील साधन का सीमांत उत्पादन (MP) घटने लगता है और फलस्वरूप कुल उत्पादन (TP) घटती हुई दर से बढ़ता है और उत्पादन की सीमांत लागत भी बढ़ जाती है ।
अन्य शब्दों में, जब एक उत्पादक लघु अवधि में अपने उत्पादन को बढ़ाने के लिए परिवर्तनशील साधनों में वृद्धि करता है तो शुरू में कुल उत्पादन बढ़ती हुई दर से बढ़ता है, फिर घटती दर से और उसके बाद धीरे - धीरे उत्पादन कम होने लगता है। 
           सबसे पहले प्रकृतिवादी अर्थशास्त्री टरगाॅट ने ये नियम दिया था और परंपरागत अर्थशास्त्रियों ने इस नियम को सिर्फ़ भूमि और कृषि क्षेत्र तक ही सीमित रखा लेकिन आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार ये नियम उत्पादन के हर क्षेत्र में लागू होता है।

 परिभाषाएँ  (DEFINITIONS) 

स्टिगलर के शब्दों में, " उत्पत्ति के अन्य साधनों की इकाइयों को स्थिर रखते हुए यदि किसी एक साधन की इकाइयों में वृद्धि की जाती है, तो एक निश्चित सीमा के पश्चात उत्पादन में वृद्धि कम होने लगती है।" 

श्रीमती जॉन रॉबिन्सन—“उत्पत्ति ह्रास नियम यह बताता है कि यदि किसी एक उत्पत्ति के साधन की मात्रा को स्थिर रखा जाए तथा अन्य साधनों की मात्रा में उत्तरोत्तर वृद्धि की जाए तो एक निश्चित बिन्दु के बाद उत्पादन में घटती दर से वृद्धि होती है।" 

प्रो. बेन्हम — “ उत्पादन के साधनों के संयोग में जैसे-जैसे किसी एक साधन का अनुपात बढ़ाया जाता है, वैसे-वैसे एक बिन्दु के बाद उस साधन का सीमांत और औसत उत्पादन घटता जाता है।" 


नियम की मान्यताएं (Assumptions of the Law) 

1) उत्पत्ति का एक साधन परिवर्तनशील होता है और अन्य साधन स्थिर रहते हैं। 
2) परिवर्तनशील साधन की समस्त इकाईयां समरूप (homogeneous) होती हैं। 
3) साधन आपस में पूर्ण स्थानापन्न नहीं होने चाहिए। 
4) स्थिर साधन अविभाज्य (indivisible) होते हैं। 
5) तकनीकी स्तर में कोई बदलाव नहीं आता है। 
6) स्थिर साधन सीमित और दुर्लभ होते हैं। 

नियम की व्याख्या अथवा उत्पादन की तीन अवस्थाएँ (Explanations of the Law or Three Stages of Production) 
इस नियम की व्याख्या तीन अवधारणाओं पर आधारित है — कुल उत्पाद, सीमांत उत्पाद एवं औसत उत्पाद। कुल उत्पाद वह उत्पादन है जो परिवर्तनशील साधनों की निश्चित इकाइयों के प्रयोग से प्राप्त होता है। सीमांत उत्पाद वह उत्पादन है जो परिवर्तनशील साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से प्राप्त होता है। औसत उत्पाद उत्पादन की वह मात्रा है जो कुल उत्पाद को परिवर्तनशील साधन की कुल इकाईयों से भाग देने पर प्राप्त होती है।

उत्पत्ति ह्रास नियम की तीनों अवस्थाओं को निम्नलिखित तालिका और रेखाचित्र की सहायता से समझा जा सकता है —

    

उपरोक्त रेखाचित्र में अवस्था - I में MP बढ़ रहा है और TP बढ़ती दर से बढ़ रहा है। अवस्था - II में MP घट रहा है और TP घटती दर से बढ़ रहा है। अवस्था - III में TP गिरना शुरू हो जाता है, क्योंकि MP ऋणात्मक है। 

1) वृद्धिमान प्रतिफल की अवस्था (Stage of Increasing Returns) –
ये उत्पादन की प्रथम अवस्था होती है। जब उत्पादक परिवर्तनशील साधनों की इकाईयां बढ़ाता है तो बढ़ता हुआ उत्पादन प्राप्त होता है। जिस अनुपात में पूँजी एवं श्रम में वृद्धि की जाती है उत्पादन उससे भी अधिक अनुपात में बढ़ता हैै इसीलिए शुरू में कुल उत्पादन सीमांत उत्पादन और औसत उत्पादन तीनों में वृद्धि होती है। 


इस तालिका में श्रम और पूँजी की पहली इकाई लगाने पर कुल उत्पादन, सीमांत उत्पादन और औसत उत्पादन
तीनों समान मात्रा में प्राप्त होते हैं। इसके बाद दूसरी, तीसरी, चौथी और पाँचवी इकाई को लगाने पर क्रमशः बढ़ती हुई दर पर सीमांत उत्पादन प्राप्त होता है। 

दूसरी इकाई का सीमांत उत्पादन 1500 मीटर है तीसरी इकाई का सीमांत उत्पादन 2000 मीटर है और चौथी इकाई का सीमांत उत्पादन 2500 मीटर है। इस तरह सीमांत उत्पादन बढ़ रहा है और कुल उत्पादन बढ़ती हुई दर से बढ़ रहा है। 

 

 इस रेखाचित्र में OX रेखा पर श्रम एवं पूँजी की इकाइयां और OY रेखा पर कपड़े का कुल उत्पादन, सीमांत उत्पादन और औसत उत्पादन मीटर में दिखाया गया है। हर अगली श्रम एवं पूँजी की इकाई से उत्पादन में बढ़ती हुई दर से वृद्धि हो रही है। 

2) ह्रासमान या घटते प्रतिफल की अवस्था (Stage of Diminishing Returns) –
यह उत्पादन की द्वितीय अवस्था होती है। जब उत्पादक अपने उत्पादन को बढ़ाने के लिए   परिवर्तनशील साधनों की इकाइयों में वृद्धि करता है तो एक अवस्था के बाद कुल उत्पादन में कम अनुपात में वृृद्धि होती है। सीमांत उत्पादन एवं औसत उत्पादन दोनों घटने लगते हैं। इस अवस्था का समापन उस बिन्दु पर होता है जहाँ सीमांत उत्पादन शून्य हो जाता है। 




इस तालिका से स्पष्ट है कि श्रम एवं पूँजी की इकाइयां बढ़ाने पर भी सीमांत उत्पादन और औसत उत्पादन घट रहे हैं। कुल उत्पादन में वृद्धि भी घटती हुई दर से हो रही है। 




ये रेखाचित्र भी घटते प्रतिफल की अवस्था की क्रियाशीलता को दर्शाता है। श्रम एवं पूँजी की दूसरी तथा तीसरी इकाईयों को लगाने पर सीमांत उत्पादन घटने लगता है। 

3) ऋणात्मक प्रतिफल की अवस्था (Stage of Negative Returns) –
यह  उत्पादन की तृतीय अवस्था है। इस अवस्था में सीमांत उत्पादन शून्य से कम या श्रणात्मक
हो जाता है और इसीलिए कुल उत्पादन एवं औसत उत्पादन दोनों घटने लगते हैं। 



तालिका और रेखाचित्र से स्पष्ट है कि श्रम एवं पूँजी की अतिरिक्त इकाइयों को बढ़ाने पर कुल और औसत उत्पादन घट रहा है और सीमांत उत्पादन श्रणात्मक हो रहा है। 


चित्र द्वारा व्याख्या (Explanation through Diagram) 



उत्पत्ति ह्रास नियम की तीनों अवस्थाओं को इस रेखाचित्र द्वारा भी समझा जा सकता है। रेखाचित्र में प्रथम अवस्था परिवर्तनशील साधन की OB मात्रा तक, द्वितीय अवस्था B और C बिन्दुओं के बीच और तृतीय अवस्था परिवर्तनशील साधन की OC मात्रा के बाद दर्शायी गयी है ।
           प्रथम अवस्था में उत्पादन में F बिन्दु तक बढ़ती हुई दर से वृद्धि होती है इसलिए TP रेखा बिन्दु F तक X- अक्ष के प्रति उन्नतोदर है। बिन्दु F को मोड़ बिन्दु कहते हैं क्योंकि इस बिन्दु के बाद उत्पादन घटती हुई दर से बढ़ता है। यहीं पर सीमांत उत्पादन (MP)अधिकतम
है। TP रेखा के बिन्दु S पर प्रथम अवस्था समाप्त हो जाती है और यहां पर श्रम की OB इकाइयां प्रयोग में लायी जा रही हैं। दूसरी अवस्था में उत्पादन घटती हुई दर से बढ़ता है और बिन्दु T पर उत्पादन अधिकतम है । यहाँ पर सीमांत उत्पादन शून्य है। जब इस बिन्दु के बाद भी श्रम की इकाइयों में वृद्धि होती है तो सीमांत उत्पादन (MP) ऋणात्मक हो जाता है और कुल उत्पादन (TP) घटने लगता है। 

           
             




 






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