हवाएँ तेज़ हों या आँधियाँ चलें
मेरे इरादों में जान अभी बाक़ी है
ग़म नहीं, रुख़ जो ईन मौसमों ने बदला है
मेरे हौसलों की उड़ान अभी बाक़ी है
ज़लज़ला तो कब का थम के ख़ामोश हुआ
लरज़ रही है ज़मी, के मेरा मकान अभी बाक़ी है
तमाम ख़्वाहिशों के नतीजे तो मिल गये यारों
हाँ, मगर उम्मीदों का इम्तेहान अभी बाक़ी है
वक़्त ले आया है आज बहुत दूर लेकिन!
दिल पे माज़ी के निशान अभी बाक़ी हैं!
No comments:
Post a Comment