बुझा के सारे चराग़ों को दिल जलाया है
अँधेरा क़िस्मत का हौसलों से ही मिटाया है
लोग फूलों भरी राहों में भी थक जाते हैं
चल के कांटो पे हम ने मंज़िलों को पाया है
ख़ुलूस ओ वफ़ा क्या है ये हम से पूछिये
साथ अपनों का गर दिया तो हाथ ग़ैरों से भी मिलाया है
बात सब्र ओ क़नाअत की हम फक़ीरों से !!
याद रखिये ये हुनर हम ने ही सिखाया है
अच्छा हुआ जो वक़्त ने पहरे लगा दिए
अब यूं भी वापस उस गली में जाता कौन
कोई हमख़याल ओ हमज़बाँ शहर में नहीं
खुले थे मेरे दरवाज़े लेकिन आता कौन
कितने अफ़साने हक़ीक़त के लिखे हैं मैंने
जिन्हें इस ख़्वाब परस्त दुनिया को सुनाता कौन
किसी ने हाल जो पूछा तो लब ख़ामोश रहे
हज़ारों ज़ख़्म हैं सीने में पर दिखाता कौन
ख़्वाब ए ग़फलत में गुम है ये जहाँ सारा
अब आदम ए ख़ाकी को होश में लाता कौन
कम नहीं दिल मेरा नाज़ुक मिज़ाजी में
इस गिरांँ क़दर ज़िन्दगी का बार फिर उठाता कौन
Aabgeena
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