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Monday, November 30, 2020

माँग की लोच Elasticity of Demand

       माँग की मूल्य सापेक्षता अथवा माँग की लोच का अर्थ

Meaning of Elasticity of Demand

माँग की लोच का विचार हमे बताता है कि एक वस्तु के मूल्य में परिवर्तन होने से उस वस्तु की माँग में कितना परिवर्तन होता है। माँग का नियम केवल इतना बताता है कि मूल्य के बढ़ जाने से वस्तु की माँग घट जाती है और मूल्य के घट जाने से वस्तु की माँग बढ़ जाती है। माँग का नियम ये नहीं बताता कि क़ीमत में बदलाव आने पर माँग की मात्रा में कितना परिवर्तन होता है अतः इस तथ्य को जानने के लिए अर्थशास्त्रियों ने मांग की लोच की धारणा को प्रस्तुत किया । लोच शब्द का अर्थ है वस्तु में घटने और बढ़ने की प्रवृत्ति जैसे रबड़, जिस पर दबाव डालने से खिंचाव पैदा हो जाता है और दबाव कम करने पर वापस अपनी स्थिति में आ जाता है। माँग की लोच क़ीमत में परिवर्तन के कारण माँग में होने वाले परिवर्तन की माप प्रस्तुत करती है। 

माँग की लोच की परिभाषाएं Definitions of Elasticity of Demand 

जे के मेहता के अनुसार, "किसी वस्तु के मूल्य में परिवर्तन के परिणामस्वरूप उसकी मांग में परिवर्तन होने की क्षमता को माँग की मूल्य सापेक्षता कहते हैं।" 

प्रो मार्शल के अनुसार, "बाज़ार में किसी वस्तु की माँग का अधिक या कम लोचदार होना इस बात पर निर्भर होता है कि एक निश्चित मात्रा में मूल्य के घट जाने पर माँग की मात्रा में अधिक वृद्धि होती है अथवा कम तथा एक निश्चित मात्रा में मूल्य के बढ़ जाने पर माँग की मात्रा में अधिक कमी होती है या कम। "

प्रो बेन्हम के अनुसार, "माँग की लोच का विचार, मूल्य में थोड़ा सा परिवर्तन होने से माँग की मात्रा पर जो प्रभाव पड़ता है, उससे संबंधित है।" 

माँग की लोच के रूप Kinds of Elasticity of Demand 

माँग की लोच के निम्नलिखित तीन रूप हैं —
1) माँग की क़ीमत लोच Price Elasticity of Demand - वस्तु के मूल्य में थोड़े से परिवर्तन के फलस्वरूप माँग की मात्रा में होने वाले परिवर्तन की माप को माँग की क़ीमत लोच कहते हैंं। 

2) माँग की आय लोच Income Elasticity of Demand - उपभोक्ता की आय में थोड़े से परिवर्तन के कारण माँग की मात्रा में होनेे वाले परिवर्तन की माप को मांग की आय लोच कहा जाता है ।

3) माँग की आड़ी लोच Cross Elasticity of Demand - संबंधित वस्तुओं की क़ीमत में थोड़ा सा परिवर्तन होने के फलस्वरूप माँग की मात्रा में होने वाले परिवर्तन की माप को माँग की आड़ी लोच कहते हैं। 

माँग की क़ीमत लोच की श्रेणियां Categories or Degrees of Elasticity of Demand 

सभी प्रकार की वस्तुओं में माँग की लोच एक समान नहीं होती है अलग - अलग क़िस्म की वस्तुओं के लिए माँग की लोच भी अलग अलग प्रकार की होती है जिसे 
पाँच श्रेणियों में विभाजित किया गया है –
1- पूर्णतः लोचदार माँग Perfectly Elastic Demand 
2- अत्यधिक लोचदार माँग Highly Elastic Demand 
3- इकाई लोचदार माँग Unitary Elastic Demand
4- बेलोचदार माँग Inelastic Demand 
5-  पूर्णतः बेलोचदार माँग Perfectly Inelastic Demand 

1) पूर्णतः लोचदार माँग Perfectly Elastic Demand ( e = ∞ ) – 



जब किसी वस्तु की क़ीमत स्थिर रहे या केवल नाम मात्र ही बदले फिर भी मांग काफ़ी बढ़ जाए या काफ़ी घट जाये तो इसे पूर्णतः लोचदार माँग या पूर्णतः मूल्य सापेक्ष माँग कहते हैं। इस प्रकार की माँग काल्पनिक है और वास्तविक जीवन में इसका कोई उदाहरण नहीं मिलता।
चित्र में DD माँग रेखा है जो कि आधार रेखा X - अक्ष के समांतर है OP क़ीमत पर माँग कभी OQ है और कभी OQ₁ । स्पष्ट है कि क़ीमत में परिवर्तन ना के बराबर है लेकिन वस्तु की माँग कभी घटी है तो कभी बढ़ी है। मार्शल ने इसे असीमित या अनंत के बराबर 
( e = ∞ ) बताया है। 

2- अत्यधिक लोचदार माँग Highly Elastic Demand ( e > 1 ) – 
    


जब किसी वस्तु की क़ीमत में परिवर्तन कम अनुपात में हो और उसकी माँग में क़ीमत के मुक़ाबले अधिक अनुपात में परिवर्तन हो जाये तो इसे अत्यधिक लोचदार
माँग कहते हैं। उदाहरण के लिए एक वस्तु की क़ीमत में 5% की कमी हो लेकिन उसकी माँग 30% बढ़ जाये तो ऐसी माँग अत्यधिक लोचदार माँग कहलाती है। इस प्रकार की माँग लोच प्रायः विलासिता की वस्तुओं में पायी जाती है। 
चित्र से स्पष्ट है कि OP₁ क़ीमत पर माँग OQ₁ है और जब क़ीमत घट कर OP₂ होती है तो माँग बढ़ कर OQ₂ हो जाती है क़ीमत में P₁ P₂ कमी आयी है जो
कि काफी कम (5%) है जबकि वस्तु की माँग Q₁Q₂बढ़ी है जो क़ीमत की तुलना में कहीं अधिक (30%) है। चित्र में DD अत्यधिक लोचदार माँग रेखा है। 


3- इकाई लोचदार माँग Unitary Elastic Demand ( e = 1 ) –


जब किसी वस्तु की माँग में उसी अनुपात में परिवर्तन हो जिस अनुपात में क़ीमत में परिवर्तन हुआ है तो ऐसी वस्तुओं की मांग लोचदार माँँग कहलाती है। इसे मूल्य सापेक्ष मांग भी कहते हैं। इस प्रकार की माँग लोच आरामदायक वस्तुओं ( जैसे - स्कूटर, टी वी, कूलर आदि) में पायी जाती है। उदाहरण के लिए अगर किसी वस्तु की क़ीमत 10% घटती है और माँग भी 10% बढ़ जाये तो माँग लोच इकाई के बराबर होती है 
चित्र से स्पष्ट है कि क़ीमत में P₁P₂ कमी होने पर वस्तु की माँग Q₁Q₂ बढ़ जाती है। चूँकि P₁P₂ =Q₁Q₂ इसलिए माँग की लोच इकाई के बराबर होगी। 

4- बेलोचदार माँग Inelastic Demand( e < 1)

 


जब किसी वस्तु की माँग में आनुपातिक परिवर्तन क़ीमत के आनुपातिक परिवर्तन से कम होता है तो इस तरह की माँग बेलोचदार माँग या मूल्य निरपेक्ष माँग कहलाती है। 
समान्य रूप से अनिवार्य एवं आवश्यक वस्तुओं की माँग बेलोचदार होती है जैसे - अनाज, नमक आदि। 
उदाहरण के लिए एक वस्तु की क़ीमत 30% कम हो जाए लेकिन उस वस्तु की माँग केवल 5% ही बढ़े तो इसे मूल्य निरपेक्ष माँग कहेंगे। 
चित्र में क़ीमत में P₁P₂(30%) की कमी होने पर माँग सिर्फ़ Q₁Q₂ (5%) ही बढ़ी है। P₁P₂ अधिक है
Q₁Q₂ से, इसलिये यह मूल्य निरपेक्ष अथवा बेलोचदार
माँग है। 


5-  पूर्णतः बेलोचदार माँग Perfectly Inelastic Demand ( e = 0 ) - 


 अगर किसी वस्तु की क़ीमत में बड़ा परिवर्तन आया है और फिर भी माँग में कोई बदलाव न आए अर्थात चाहेे क़ीमत बढ़े या घटे लेकिन माँग अपनी जगह स्थिर रहे तो ऐसी वस्तु की माँग पूर्णतः बेलोचदार माँग कहलाती है। जीवन रक्षक दवाओं एवं कुछ अनिवार्य वस्तुुओं की माँग पूर्णतः बेलोचदार कहलाती है जबकि यह माँग व्यावहारिक तौर पर कहीं भी देखने को नहीं मिलती। 

चित्र में DD पूर्णतः बेलोचदार माँग रेखा है जो आधार रेखा X- अक्ष के लम्बवत है। क़ीमत OP से बढ़ कर OP₂ और फिर OP₁ हो जाती है लेकिन माँग OD के बराबर ही बनी रहती है। माँग में कोई भी बदलाव नहीं आया है। 


माँग की क़ीमत लोच को प्रभावित करने वाले कारक /घटक 

Factors Affecting Elasticity of

Demand 

1. वस्तु की प्रकृति या स्वभाव Nature of goods 
 जिन वस्तुओं की आवश्यकता रोज़़ पड़ती है उनकी क़ीमत में परिवर्तन होने का माँग पर कम असर होता है जैसे अनाज, सब्ज़ियां, दूूध एवं दवाएं आदि। 
       जबकि विलासिता की वस्तुओं की क़ीमत में परिवर्तन का माँग पर बड़ा असर पड़ता है जैसे ए सी, फ्रिज, कार, बाइक आदि।

2. स्थानापन्न वस्तुओं का उपलब्ध होना Availability of Substitutes - 
जब किसी वस्तु की स्थानापन्न वस्तुएं बाज़ार में उपलब्ध होती हैं तो ऐसी वस्तुओं की माँग अधिक लोचदार होती है क्योंकि वस्तु की क़ीमत के बढ़ते ही उपभोक्ता उसके विकल्प खरीदना शुरू कर देते हैं जैसे नेस्कैफे का मूल्य बढ़ते ही लोग ब्रू काॅफ़ी का उपभोग करना चाहेंगे। 
   अगर स्थानापन्न वस्तुओं की क़ीमत में वृद्धि होगी तो लोग वापस पहली वस्तु खरीदना चाहते हैं । 

3. उपभोक्ता की आय Consumer's Income-
जिनकी आय कम होती है वे उपभोक्ता वस्तु की क़ीमत कम होने पर अधिक मात्रा ख़रीद सकते हैं जबकि ऐसे उपभोक्ता जिनकी आय ज़्यादा होती है वो बढ़ी हुई क़ीमत पर भी उस वस्तु को खरीदने की क्षमता रखते हैं।अतः उपभोक्ता की आय और उनकी प्रकृति भी किसी वस्तु की माँग की लोच को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण घटक है। 

4. वस्तु के मूल्य का स्तर Price level of any good - किसी वस्तुु की क़ीमत का स्तर भी मांग की लोच को प्रभावित करता है। अगर वस्तु टी वी, लैपटॉप, मोबाइल फोन आदि है तो क़ीमत ज़्यादा होने के कारण क़ीमत में बदलाव का माँग पर काफी असर पड़ता है। 
      जबकि कम मूल्य की वस्तुओं के मूल्य में बदलाव का माँग पर प्रभाव न के बराबर होता है। 
 
 
      jabउ प भ    ।  है । । पू       र्ण की तः लोचदार माँग की स्थिति में माँग रेखा X- अक्ष के समांतर होती है। चित्र में DD रेखा पूर्णतः लोचदार माँग की रेखा है। OP क़ीमत पर माँग कभी OQ है और कभी OQ1 है 

Friday, November 27, 2020

Malnutrition कुपोषण 9th Home Science

                Malnutrition

Malnutrition is a serious condition that happens when our diet does not contain the right amount of nutrients.It can be a result of starvation.Malnutrition can also occur if a person can not properly digest nutrients of the food. In other words malnutrition is a condition that results from nutrients deficiency or over consumption. It may cause serious health issues.

                             Types of Malnutrition

1) Under Nutrition - Under nutrition means not getting enough nutrients. Regularly less quantity of proper food is the main reason of under nutrition. People suffering from under nutrition have deficiencies in vitamins and minerals. specially iron, zinc, vitamin A & iodine. Under nutrition may cause weight loss, fatigue, delayed wound healing, depression and anxiety. Kwashiorkor is a severe protein deficiency & Marasmus is severe calorie deficiency.
2) Over Nutrition -  Over nutrition means getting more nutrients than needed. Having excess amount of food is the main reason of over nutrition.Over weight & obesity are the two signs of over nutrition. Excessive consumption of calories, fats or proteins may cause over nutrition. 
3) Unbalanced Diet - if some nutrients are present in excess in our diet and there is lack of other important nutrients so this type of diet is called unbalanced diet.
4) Deficiency of specific nutrients - Lack of any specific nutrient in our diet may cause many deficiencies. For example Kwashiorkor, Goiter, Night blindness, scurvy & Rickets.

Diseases caused by malnutrition 

1)Kwashiorkor - Kwashiorkor is a severe protein deficiency. It effects 1 year old to 4 years old children. The symptoms of Kwashiorkor are —
i) it effects growth of the children . 
ii) Child looses body weight.
iii) Skin becomes wrinkled.
iv) Hands and legs become weak. 
v) Body parts particularly legs are swollen.
vi)  Brain development decreases. 
vii) Child gets irritable and often cries.
Treatment- Kwashiorkor can be treated by taking more proteins and more calories because it is caused by lack of protein in our diet. Every cell in our body contains protein and we need protein to repair cells & make new cells.
2)Marasmus - Marasmus is caused by lack of calories & proteins in our diet. It usually occurs in children. Marasmus is a condition of severe malnutrition. The symptoms of Marasmus are —
i) Children have lost a lot of muscle mass and seems to be a skeleton only. 
ii) Skin becomes wrinkled & dry.
iii) Respiratory infections occur. 
iv) Mental & physical development are effected badly. 
v) Food does not digest properly. 
vi) Immunity becomes very weak.
Treatment - Marasmus can be treated by taking carbohydrates and protein rich food. Poverty is the main reason of this disease so we should provide enough quantity of proper food to poor children.
3) Night blindness - Night blindness is a condition of the eyes in which vision is normal in daylight but poor at night or in a dim light. It is caused by vitamin A deficiency.
Treatment - Night blindness can be treated by taking vitamin A rich diet. This disease can also be treated by Vitamin A tablets and injections as suggested by the doctor.
4) Anaemia- Anaemia is a condition in which the red blood cells count or hemoglobin is less than normal in the blood. Hemoglobin is found in the red blood cells. Anaemia is defined as level of hemoglobin is less than 14gram/100ml blood. In this condition our body tissues/cells do not get enough oxygen and the person becomes weak. The common symptoms of anaemia are —
 Headache 
 Lack of appetite 
 Difficulty in breathing 
 Weakness & tiredness 
 Skin becomes pale in colour
 Indigestion or poor digestion 
 heart beat increases 
generally there are two main reasons of anaemia - lack of minerals and iron & lack of vitamin B12 or folic acid in the diet. 
Treatment - Anaemia can be treated by taking balanced diet and dietary supplements. We should take more iron and minerals to fight with anaemia. 
5) Rickets - Rickets is a bone disorder caused by a deficiency of vitamin D, calcium or phosphate. It generally found in children. In Rickets the bones of a child become weak and do not bear body weight. This disease may also effects on  the proper development of muscles. It effects on the mood of the child. Child seems tired and sad all time. The child couldn't sleep well. Appropriate supplements with calcium and vitamin D can treat the defects of bones. Vitamin D has been referred to as the "sunlight vitamin" because it is made in our skin when we are exposed to sunlight. Vitamin D founds in small amount only in few foods such as fatty fish, cod - liver oil & eggs. 
6) Scurvy - scurvy is a disease caused by severe vitamin C deficiency. Some common symptoms of scurvy are - 
lack of appetite 
weight loss 
anaemia 
swelling and pain in legs 
swollen and bleeding gums 
Bones and teeth are also effected in this disease. Person feels pain and swelling in the joints of bones.  Sometimes trouble in breathing is also caused by scurvy. 
    This disease is treated by extra quantity of vitamin C in the form of oral medicines and injections. We should add fresh fruits (orange, lemon, tomatoes, mango, guava, papaya & pine apple) and green vegetables (cabbage, spinach broccoli & capsicum) in our diet. 

 


Tuesday, November 24, 2020

माँग फलन DEMAND FUNCTION

 माँग फलन क्या है?

What is demand function?

एक वस्तु की माँग को कई अलग अलग तत्व निर्धारित करते हैं। जो फलन (function) किसी वस्तु की माँग और उसके निर्धारक तत्वों के मध्य संबंध को दर्शाता है वह माँग फलन कहलाता है। माँग फलन दो प्रकार का होता है –
व्यक्तिगत माँग फलन    और   बाज़ार माँग फलन

1) व्यक्तिगत माँग फलन (Individual Demand Function) - एक व्यक्ति या उपभोक्ता की माँग को कई अलग अलग तत्व निर्धारित करते हैं व्यक्तिगत माँग फलन इसी संबंध को दर्शाता है। इसे निम्नलिखित तरीक़े़ से व्यक्त किया जाता है –
 

2) बाज़ार माँग फलन (Market Demand Function) - बाज़ार में किसी वस्तु की कुल माँग को कई अलग अलग तत्व निर्धारित करते हैं बाज़ार माँग का अर्थ है एक बाज़ार में वस्तु की कुल माँग (बाज़ार माँग = कुल व्यक्तिगत माँगों का योग)। किसी वस्तु की बाज़ार माँग तथा उसके विभिन्न निर्धारक तत्वों के मध्य संबंध को बाज़ार माँग फलन व्यक्त करता है।




                माँग के निर्धारक तत्व

        Determinants of Demand

      Influencing/Affecting factors
                    of  Demand
किसी वस्तु की माँग को उसकी क़ीमत के अलावा और भी कई बातें या तत्व प्रभावित करते हैं जो निम्नलिखित हैं —
1) वस्तु की उपयोगिता
 (Utility of the goods) 
एक निश्चित समय में किसी वस्तु की माँग उस वस्तु की उपयोगिता पर निर्भर होती है। जिस वस्तु में मनुष्य की आवश्यकता पूर्ति की क्षमता अधिक होती है उस वस्तु की माँग भी ज़्यादा होती है और जिस वस्तु की उपयोगिता कम होती है उसकी माँग भी कम की जाती है। 
2) आय का स्तर 
( Level of income) 
उपभोक्ता की आय का माँग पर सीधा असर पड़ता है। जब व्यक्ति की आय अधिक होती है तो वस्तु की माँग बढ़ जाती है इसके विपरीत आय घटने पर माँग भी घट जाती है। 
3) धन का वितरण 
(Distribution of wealth)
यदि समाज में धन का वितरण असमान है, धन केवल कुछ ही धनी व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित है तो विलासिता की वस्तुओं की माँग अधिक होती है। यदि सरकार कर tax द्वारा या अन्य उपायों से धन के वितरण को समान करने का प्रयास करती है तो समाज में आवश्यक एवं आरामदायक वस्तुओं की माँग बढ़ती है क्योंकि मध्यम और निर्धन वर्ग की आय में वृद्धि हो जाएगी। 
4) संबंधित वस्तुओं की क़ीमत 
( price of related goods ) 
संबंधित वस्तुएं दो प्रकार की होती हैं –
a) स्थानापन्न वस्तुएं ( Substitute goods) - ऐसी वस्तुऐंं जिनका उपयोग एक दूसरे के स्थान पर  किया जाता है उन्हे स्थानापन्न वस्तुुएं कहा जाता है जैसे चाय काॅफ़ी, ज्वार बाजरा, चना मक्का, चीनी तथा गुड़़ आदि। 
b) पूरक वस्तुएं (Complementary goods) - ऐसी वस्तुए  उपयोग एक साथ होता है उन्हें पूरक वस्तुएं कहा जाता है जैसे कार - पेट्रोल, स्याही - क़लम, डबल रोटी - मक्खन आदि। 
यदि स्थानापन्न वस्तुओं की क़ीमत बढ़ती है तो मुख्य वस्तु की माँग भी बढ़ जाएगी और अगर स्थानापन्न वस्तुएं सस्ती हो जाएं तो मुख्य वस्तु की माँग घट जाएगी। उदाहरण के लिए काॅफ़ी की क़ीमत में वृद्धि होगी तो चाय की माँग ज़्यादा हो जाएगी । 
इसी तरह जब पूरक वस्तुओं का मूल्य कम हो जाता है तो मुख्य वस्तु की माँग बढ़ जाती है और जब पूरक वस्तुओं का मूल्य बढ़ता है तो मुख्य वस्तु की माँग घट जाती है। उदाहरण के लिए मक्खन का मूल्य कम हो तो डबल रोटी की माँग अधिक होगी ।
5) उपभोक्ता की रुचि तथा फ़ैशन (Taste of consumer & Fashion) -  जो वस्तुएं वर्तमान फ़ैशन की होती हैं उन वस्तुओं में उपभोक्ताओं की रुचि  अधिक होती है और ऐसी वस्तुओं की माँग भी उपभोक्ता अधिक करते हैं। इसके विपरीत जो वस्तुएं फ़ैशन से बाहर हो जाती हैं उनमें उपभोक्ता की रुचि नहीं रहती और ऐसी वस्तुओं की मांग घटने लगती है।
6) मौसम तथा जलवायु ( Weather & Climate) - वस्तुओं की माँग पर मौसम का भी असर पड़ता है। जैसे कूलर, एसी, कोल्ड-ड्रिंक आदि की माँग गर्मी के मौसम में अधिक होती है और गर्मियों की समाप्ति पर उपभोक्ता इन वस्तुओं की मांग कम करते हैं भले ही क़ीमत में छूट दे दी जाए। रूम हीटर, ब्लोवर, कम्बल, गीज़र, इलैक्ट्रिक कैटल आदि वस्तुओं की मांग सर्दियों में बढ़ जाती है।
7)भविष्य में मूल्य परिवर्तन की आशा (Expected future change in price ) - जब उपभोक्ता को यह आशा होती है कि  का मूल्य भविष्य में बढ़ सकता है तो वर्तमान समय में भी माँग बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए युुद्ध की संंभावना, सरकारी नीति या दैवीय विपत्ति की आशंका आदि।
8)व्यापार की दशा में परिवर्तन ( Changes in trade conditions) - व्यापार में कभी तेज़ी कभी मंदी की दशा आती रहती है। तेज़ी के समय में लाभ  अधिक होने से लोगों की आय बढ़ जाती है और क़़ीमत ज़्यादा होनेे पर भी मांग कम नहीं होती है। मंदी काल में व्यक्तियों की आय कम हो जाती है और वस्तु की क़ीमत घटने पर भी मांग में कमी आती है।
9)जनसंख्या (Population) - यदि किसी देश में जनसंख्या बढ़ रही है तो वस्तुओं की मांग भी बढ़ जाती है और देश की जनसंख्या घटने पर वस्तुओं की मांग भी कम हो जाती है।
10)मुद्रा की मात्रा में परिवर्तन (Change in the quantity of money) - यदि देश में मुद्रा की  मात्रा बढ़ जाती है तो उपभोक्ता की क्रय शक्ति भी बढ़ जाती है और वस्तुओं की मांग में वृद्धि होती है। क्रय शक्ति के कम होने पर वस्तुओं की मांग में भी कमी आ जाती है। 

Monday, November 23, 2020

माँग DEMAND

            माँग (Demand)

 आम बोलचाल की भाषा में किसी वस्तु या सेवा को प्राप्त करने की इच्छा को ही माँग समझा जाता है। माँग  इच्छा और आवश्यकता इन तीनों शब्दों का एक ही अर्थ निकाला जाता है लेकिन अर्थशास्त्र में इन तीनों शब्दों का अर्थ अलग अलग है। माँग का अर्थ वस्तु को खरीदने की वह इच्छा है जिसके लिए पर्याप्त क्रय शक्ति के साथ साथ ख़र्च करने की तत्परता भी हो।

     माँग उन उत्पादों और सेवाओं की संख्या है जिसे एक उपभोक्ता ख़रीदना चाहता है। उदाहरण के लिए एक ग़रीब इंसान का इंग्लैंड जाने की कल्पना या विचार इच्छा है जबकि अमीर व्यक्ति अपने साधनों से हवाई जहाज़ का टिकट लेना चाहता है तो यह उसकी आवश्यकता कहलाएगी। चूँकि वह टिकट ख़रीदने में सक्षम है और जब वह टिकट ख़रीद लेता है तो आवश्यकता माँग के रूप में बदल जाती है।

      माँग की परिभाषा      Definition of Demand 

 प्रो. जे. एस. मिल -  " माँग शब्द का अभिप्राय मांगी गई उस मात्रा से लगाया जाता है जो एक निश्चित क़ीमत पर ख़रीदी जाती है।"
          " Demand is an amount of a thing which a person is willing to buy at a given price."         
                                                  __   J. S. Mill
 

         
 
प्रो  बेन्हम - " किसी दी गई क़ीमत पर वस्तु की माँग वह मात्रा  है जो उस क़ीमत पर एक निश्चित समय पर ख़रीदी जाती है। "
     " The demand for anything, at a given price is the amount of it which will be bought per unit of time at that price."
                                                  __  Benham


प्रो. मेयर्स -" किसी वस्तु की माँग उन मात्राओं की तालिका होती है जिन्हें क्रेता एक समय विशेष पर सभी संभव क़ीमतों पर खरीदने को तैयार रहता है।"
   
" The demand for a good is a schedule of the amounts that buyers would be willing to purchase at all possible prices at any one instant of time.'' 
                                                 __   Meyers
    
         इन परिभाषाओं के  आधार पर यह निष्कर्ष  निकलता है कि माँग में निम्नलिखित पांच तत्वों का होना अनिवार्य है —
1) वस्तु की इच्छा    (Desire for a good) 
2)वस्तु खरीदने के लिए पर्याप्त साधन   (Sufficient resources to buy the goods) 
3) साधन व्यय करने की तत्परता  (Willingness to spend) 
4) एक निश्चित क़ीमत     (Given price) 
5) निश्चित समयावधि   (Given time period) 

माँग तालिका/माँग सारणी/ माँग अनुसूची 
    Demand schedule/table 
     माँग तालिका एक निश्चित समय में किसी वस्तु की माँगी जाने वाली मात्रा को दर्शाती है । माँग तालिका वस्तु के मूल्य  एवं माँँग गयी मात्रा में संबंध को व्यक्त करती है । माँग अनुसूची दो प्रकार की होती है —
1. व्यक्तिगत माँग तालिका 
2. बाज़ार माँग तालिका 

1) व्यक्तिगत माँग तालिका ( Individual Demand Schedule  –  इस तालिका से किसी एक व्यक्ति द्वारा किसी समय में विभिन्न मूल्यों पर मांगी जाने वाली वस्तु की मात्रा की जानकारी मिलती है। व्यक्तिगत माँग तालिका में बायीं ओर वस्तु के मूल्य को और दायीं ओर वस्तु की मांगी गयी मात्रा को दिखाया जाता है। 

       
   
   तालिका से स्पष्ट है कि जैसे - जैसे वस्तु की क़ीमत कम हो रही है वैसे - वैसे वस्तु की अधिक इकाइयों की माँग की जा रही है अर्थात मूल्य घटने पर माँग बढ़ रही है। इस प्रकार व्यक्तिगत माँग तालिका वस्तु के मूल्य और उसकी माँग के बीच विपरीत संबंध को स्पष्ट करती है। 

2) बाज़ार माँग तालिका (Market Demand Schedule) – किसी निश्चित समय पर वस्तु की विभिन्न क़ीमतों पर समस्त बाज़ार की माँग को बताने वाली तालिका को बाज़ार माँग तालिका कहा जाता है ।दूसरे शब्दों में बाज़ार माँग तालिका किसी बाज़ार में किसी वस्तु की अलग-अलग क़ीमतों पर सभी ग्राहकों की कुल माँग को प्रदर्शित करती है। इसे व्यक्तिगत माँग तालिकाओं की सहायता से तैयार किया जाता है। 
                  
                              बाज़ार माँग तालिका 
      
 
 
    इस तालिका में उपभोक्ता x,y और z की व्यक्तिगत माँग के योग को अंतिम काॅलम दिया गया है जिसे बाज़ार माँग कहते हैं। 

                   माँग वक्र या माँग रेखा 

                    Demand Curve 

 जब हम माँग तालिका को रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित करते हैं तो हमें माँग वक्र प्राप्त होता है। इस तरह माँग वक्र माँग तालिका का रेखीय प्रदर्शन है। 
             

 
    माँग तालिका की तरह माँग वक्र भी किसी वस्तु के मूल्य और उसकी माँग के मध्य विपरीत संबंध को दर्शाता है।  


          माँग वक्र में परिवर्तन 
Change in Demand Curve 
    किसी वस्तु की माँग में परिवर्तन के मुख्य दो कारण होते हैं पहला स्वयं उसी वस्तु के मूल्य में परिवर्तन और दूसरा कारण है अन्य तत्वों में आने वाला परिवर्तन। जिसमें उपभोक्ता की आय, पूरक तथा स्थानापन्न वस्तुओं की क़ीमत एवं भविष्य में क़ीमत बढ़ने या घटने की आशा आदि बातें शामिल होती हैं। इसकी व्याख्या निम्नलिखित है - 
1) माँग वृद्धि होना (अन्य तत्वों में परिवर्तन के कारण) 
2) माँग में कमी आना (अन्य तत्वों में परिवर्तन के कारण) 
3) माँग का विस्तार होना (स्वयं वस्तु के मूल्य में परिवर्तन के कारण) 
4) माँग का संकुचन होना (स्वयं वस्तु के मूल्य में परिवर्तन के कारण) 

1)माँग में वृद्धि (Increase in demand) 
 जब वस्तु के मूल्य में कोई बदलाव न आये लेकिन दूसरे तत्वों में से किसी एक में बदलाव की वजह से उस वस्तु की माँग बढ़ जाए तो ये स्थिति माँग में वृद्धि की स्थिति कहलाती है और मांग में वृद्धि की स्थिति में माँग वक्र बाएं से दाएं खिसक (shift) जाता है। 
   
इस चित्र से 
 स्पष्ट है कि वस्तु की क़ीमत में कोई परिवर्तन नहीं आया है लेकिन किसी अन्य तत्व में परिवर्तन की वजह से वस्तु की माँग 80 इकाइयों से बढ़कर 115 इकाइयों पर पहुंच गई है और माँग वक्र D से खिसक कर D2 पर शिफ्ट हो गया है।

कारण –
 उपभोक्ता की आय में वृद्धि 
 स्थानापन्न वस्तुओं का मूल्य बढ़ना 
 पूरक वस्तुओं की क़ीमत कम हो जाना 
 भविष्य में वस्तु की क़ीमत बढ़ने की आशा 

2) माँग में कमी (Decrease in demand) 
  जब वस्तु की क़ीमत वही रहे लेकिन कुछ अन्य तत्वों में आने वाले परिवर्तन की वजह से उस वस्तु की माँग कम हो जाए तो यह स्थिति माँग में कमी की स्थिति कहलाती है और माँग की कमी के कारण माँग वक्र अपने बाएं खिसक कर पीछे की तरफ शिफ्ट हो जाता है। 
 
  

   इस रेखाचित्र से स्पष्ट है कि वस्तु की क़ीमत में कोई भी बदलाव नहीं आया है लेकिन किसी अन्य तत्व में परिवर्तन की वजह से वस्तु की माँग 115 इकाइयों से घट कर 80 इकाइयों पर आ गई है और माँग वक्र D से खिसक कर पीछे D2 पर शिफ्ट हो गया है।

कारण –
  उपभोक्ता की आय का कम हो जाना
  स्थानापन्न वस्तुओं की क़ीमत कम हो जाना 
  पूरक वस्तुओं का मूल्य बढ़ जाना 
  भविष्य में वस्तु की क़ीमत घटने की आशंका 


3)माँग का विस्तार(Expansion of demand) 
  जब अन्य तत्वों में कोई बदलाव न आए लेकिन स्वयं वस्तु की क़ीमत घटने के कारण वस्तु की माँग बढ़ जाये तो इसे माँग का विस्तार कहा जाता है  ऐसी स्थिति में  माँग वक्र अपनी जगह से नहीं खिसकता। केवल माँग अपने दायींं ओर आ जाती है और क़ीमत नीचे की तरफ आ जाती है। 
   
 

    इस रेखाचित्र से स्पष्ट है कि वस्तु की क़ीमत ₹ 16 से कम होकर ₹ 12 हो गई है जिसकी वजह से वस्तु की माँग 60 इकाइयों से 80 इकाइयों तक बढ़ गई है। माँग वक्र अपने स्थान पर है लेकिन वक्र पर माँग का बदलाव देखा जा सकता है। वर्तमान माँग बिन्दु A से खिसक कर बिन्दु B पर आ गई है। इसे ही माँग का विस्तार कहते हैं। 
4)माँग में संकुचन(Contraction of demand) 
 जब अन्य तत्वों में कोई बदलाव न आया हो लेकिन स्वयं वस्तु की क़ीमत बढ़ने के कारण वस्तु की माँग घट जाए तो इसे माँग में संकुचन होना कहा जाता है। माँग संकुचन की स्थिति में भी माँग वक्र अपने स्थान से नहीं खिसकता है। केवल माँग बायीं तरफ आ जाती है और क़ीमत ऊपर की ओर बढ़ती है। 
  

  रेखाचित्र से स्पष्ट है कि वस्तु की क़ीमत ₹12 से बढ़ कर ₹16 हो गई है जिसकी वजह से वस्तु की माँग 80 इकाइयों से घटकर 60 इकाइयों पर आ गई है। माँग वक्र
अपने स्थान पर है लेकिन वर्तमान मागँ बिन्दु A से बिन्दु B पर बन गई है जिसे माँग में संकुचन होना कहा जाता है। 

Friday, November 20, 2020

Balanced Diet 9th Home Science

          Balanced Diet

             A balanced diet is one that fulfills all of a person's nutritional  needs. Balanced diet is good for our physical and mental health. It can reduced the risk of obesity, heart disease, diabetes, hypertension and depression. 
           A balanced diet contains the proper quantities and proportions of needed nutrients to maintain good health such as carbohydrates,fats, fibers, proteins, vitamins, minerals and water. We should add fruits, vegetables, grains, dairy products and oils to our diet. Different food items have different proportions of nutrients present in them. The requirement of nutrients depends upon age, gender and health of a person. 


  Qualities of balanced diet 

1) Full of proteins-  Balanced diet is full of proteins and minerals. These nutrients are helpful in the growth of our body. Some nutrients improve body's resistance to disease. We can obtain different nutrients from different types of food. 

2) Containing Protective Nutrients -  A balanced diet contains protective nutrients. Vitamin A, B, C, D, E & K are protective nutrients. They protect us from diseases and keep our body and mind healthy. 

3) Provides enough energy -  Balanced diet also provides enough energy to to our body. Some part of our energy requirements is fulfilled by fat. Fats can be found in butter, ghee, milk and oils etc. Carbohydrates also provide energy and it can be found in rice, bread, wheat & potatoes etc.  

4- Based on age & gender -  Balanced diet of a person depends on his/her age, gender  occupation and climate. Different kinds of people need a different balanced diet. It wouldn't be same for two different persons. 

              Determining factors 

                                of                   

                        balanced diet

    A balanced diet may be defined as the diet which contains all the nutrients in correct amount.Different Quality and different quantity of diet is required for different persons.Diet of a person depends on various factors. some common but important factors are —
1) Age                                2) Occupation
3) Gender                         4) Climate 
5) Health                          6) Body built
7) Special conditions

1)Age - Our requirement for food mainly depends on our age. A child needs more fats and proteins for proper growth of body. An old person doesn't need much fat as in old age the digestion becomes weak. 

2) Occupation -  Some persons do hard physical work such as labour, carpenter & athlete. They need more fats and carbohydrates  as a they lose a big amount of energy in their daily routine. Such persons need more quantity of food to fulfill this lose of energy. Many people do hard mental work such as lawyer, engineer,doctor and teacher. Such persons need more proteins than carbohydrates. 

3) Gender -  Balanced diet depends on the gender of a person. Physical structure and activities of males and females are not same so female needs less calories and less amount of food than male. 

4) Climate - Our diet depends upon the climate in which we live. people live in hot climate need less amount of fats & proteins. They should take light food in hot climate and  in summers.  Persons live in cold climate need more quantity of fats and proteins. 

5) Health -  Healthy persons need more nutrients than unhealthy persons. They perform a lot of physical activities so their requirement of a balanced diet is also different. The persons recovering from illness need more proteins  minerals and vitamins to repair the damage caused by illness. 

6- Body built - Our body weight is also a major determining factor of balanced diet. Overweight person should take a diet which is rich in fibers while lean or slim person needs more proteins and fats. 

7) Special conditions- There are some special conditions in which a human body needs extra diet and more amount of carbohydrates, fats, proteins, vitamins & minerals.A pregnant lady, feeding mother, a person recovering from illness or surgery need extra nutrients. 
  


Monday, November 16, 2020

Dressing up 9th Home Science

                      

          DRESSING UP

   

           To dress up or dressing up means decoration of a person's body. We can decorate ourselves with suitable and attractive costumes. Costumes indicate or show the interest & mood(nature) of a person. perfect and good looking dress enhance the beauty of our personality, give self confidence and happiness. We should always select our clothes according to the age, gender and height. 

         We can say that suitable costumes are the most important thing for better development of a person


                 SOME GENERAL RULES 

                              ABOUT 

                   WEARING CLOTHES 


1-  Right Measurements and fine stitching are the two main things for our clothes. Such type of clothes are comfortable and good looking. We should avoid to wear very loose as well as tight fitting costumes because both are uncomfortable for us. 


2- We should maintain balance in our clothing and fashion. Never select old fashion dresses and also avoid to wear a dress just like a film star. 


3- The clothes which we wear on any occasion or in the party are not daily wears so always choose best quality function wear. On the other hand our daily wear clothes should be durable and easy to wash. 


             Qualities of Clothes 


1- Durability- We spend a lot of money for buying clothes so always buy durable clothes. It is the most important quality of any cloth. Generally terriline, terricott and dacron are very durable cloth materials. They are made from artificial or synthetic fibers. 


2- Capacity to absorb sweat- We should select our clothes according to the climate. India's climate is hot and cotton clothes are suitable for hot weather. They absorb sweat very quickly. If we wear terriline in summer it will not absorb sweat and we feel uncomfortable. 


3- Easy to wash- Regular use of clothes make them dirty and we need to wash our clothes time to time. We can wash some clothes at home easily but some clothes are very difficult to wash at home. We should buy a cloth which is easy to use and easy to wash. 


4- Skin friendly- Our body heat pass easily through some clothes while some clothes could not pass  our body heat. We should select our clothes according to the season. Cotton clothes are good for summers as it keep the body cool while woollen clothes keep the body warm in winter season. 


5- Shrinkage free- Some clothes are shrinked after wash and it becomes difficult to wear. To avoid this problem soak the clothes in water overnight before stitching. 


some important points about                  the selection of suitable costumes 


1- Age- Age is the most important factor for best selection of costumes. Dark and bright colours are good for children, girls and newly married women but such colours are not suitable for adults and old age persons. Light shades of all colours are best for adults and older ones. These colours give a grace to their personalities. 


2- Height- Height is another major factor in the selection of costumes. Horizontal strips, wide border and big flowers pattern costumes are suitable for good height persons while vertical strips, narrow border and small floral design are best for short height persons. 


3- Face cut- The shape and size of our faces are different from each other so we should wear perfect neck shape as per the shape of face. Persons whose faces are round in shape should select v-shape and square neck designs. Persons with oval shaped face may choose round neck designs. It goes well with their personalities.

4-Shoulders & Arms - Some people have wide shoulders and thick arms. Such people may wear fine fitting costumes. Persons with slender shoulder and thin arms should wear long sleeves with loose fitting.

5- Combination of costumes & colour-
Perfect combination of clothes makes our personalities attractive. Always wear perfect matching clothes. For example - silk blouse goes well with silk saree. Pink, orange and dark colours are suitable for fair complexion girls. Light yellow, light green and any other light colour is good for wheatish and dark complexion.

Everyone wants to look charming & smart and our costumes play an important role in this field. Whenever you go to purchase clothes first of all you have to aware about your personality. Remember perfect clothing habit enhance the beauty of personality.






Wednesday, November 11, 2020

तटस्थता वक्र Indifference Curve

 अनाधिमान वक्र/उदासीनता वक्र/तटस्थता वक्र Indifference Curve

  अनाधिमान वक्र दो वस्तुओं के ऐसे संयोगों (bundles) का रेखा चित्र होता है जो उपभोक्ता को समान संतुष्टि प्रदान करते हैं यह वक्र उपभोक्ता के व्यवहार को दर्शाता है।  उपभोक्ता को मिलने वाली उपभोग सामग्री से वक्र के किसी भी बिंदु पर उसे एक समान संतुष्टि मिलती है। अन्य शब्दों में, अनाधिमान वक्र उसे कहते हैं जिसके सभी बिंदुओं पर उपभोक्ता को समान संतुष्टि प्राप्त हो अतः वह इनके प्रति उदासीन होता है तभी इस वक्र को तटस्थता वक्र एवं उदासीनता वक्र भी कहा जाता है।
            यह वक्र मुख्य रूप से दो वस्तुओं के बीच रुचि को दर्शाता है अगर उपभोक्ता एक वस्तु के उपभोग को बढ़ाना चाहता है तो उसे दूसरी वस्तु के उपभोग को घटाना होगा। 
उदाहरण के लिए - यदि एक बच्चे को निम्नलिखित में से कुछ भी दे दिया जाए तो उसे समान संतोष मिलता है - 
8 बिस्कुट            1 चॉकलेट 
6 बिस्कुट            2 चॉकलेट 
4 बिस्कुट            3 चॉकलेट 
2 बिस्कुट            4 चॉकलेट 
     अगर बच्चे को 8 बिस्कुट और 1 चॉकलेट मिलती है तो वह संतुष्ट है  यदि 6 बिस्कुट और 2 चॉकलेट मिले तब भी वह संतुष्ट है। इसी तरह  बिस्कुट और चॉकलेट के बाक़ी दो bundles से भी बच्चे को एक समान संतुष्टि मिलती है। अब अगर एक ऐसा वक्र खींचा जाए जो इन चारों बिंदुओं से होकर गुज़रे तो वह उस बच्चे के लिए उदासीनता वक्र होगा। 
           इसी तरह दूसरा उदाहरण लेते हैं। माना कि विजय के पास 1 पेन और 12 पेंसिल हैं  और उससे पूछा जाए कि एक और पेन के लिए वह अपनी कितनी पेंसिल दे देगा जिससे उसकी संतुष्टि पर कोई असर न पड़े अर्थात संतुष्टि का स्तर बना रहे और वह 6 पेंसिल देने के लिए मान जाता है  तो अब उसके पास 2 पेन तथा 6 पेंसिल होंगी और इन दोनों वस्तुओं के इस bundle से विजय उतना ही संतुष्ट है जितना पहले वाले bundle से था। इसे एक तालिका द्वारा समझा जा सकता है -  
           
     
       इस तालिका में दोनों वस्तुओं के अलग-अलग चार संयोग (bundles) दिए गए हैं जिनसे उपभोक्ता को समान संतुष्टि मिल रही है। विजय ने एक वस्तु (पेन) की अतिरिक्त इकाई के लिए दूसरी वस्तु (पेंसिल) की 6 इकाइयों का त्याग किया है। यह प्रतिस्थापन दर कहलाती है अतः 1 पेन की प्रतिस्थापन दर 6 पेंसिल है। 
         इसी तालिका को जब ग्राफ के रूप में दर्शाया जाता है तो वही उदासीनता वक्र कहा जाता है। 
   
  

              यह ग्राफ तालिक में दिखाए गए संयोगों को ही प्रस्तुत कर रहा है। जिनके प्रति उपभोक्ता तटस्थ है इसीलिए इसे तटस्थता वक्र कहते हैं। 


                               तटस्थता मानचित्र 

              Indifference Curve Diagram 

जब चित्र में एक से ज़्यादा तटस्थता वक्र दर्शाए जाते हैं तो इसे तटस्थता मानचित्र (Indifference Map) कहा जाता है। ये उपभोक्ता की संतुष्टि के अलग अलग स्तरों को दर्शाते हैं। 


   


 

                         तटस्थता वक्र की विशेषताएँ 

          Characteristics of Indifference Curve

1) तटस्थता वक्र की ढलान बाएँ से दाएँ नीचे की तरफ़ होती है  जिसका तात्पर्य है कि जब एक वस्तु का उपभोग बढ़ाया जाता है तो दूसरी वस्तु का उपभोग घटता है। 
2) तटस्थता वक्र मूल बिन्दु की ओर उत्तल  होता है जिसका कारण है जैसे जैसे नीचे आते हैं प्रतिस्थापन दर घटती जाती है। 
3) तटस्थता वक्र कभी दूसरे तटस्थता वक्र को काटते नहीं क्योंकि उच्च वक्र पर वस्तुओं के संयोग भी उच्च होते हैं और संतुष्टि भी अधिक होती है। 
4) उच्च तटस्थता वक्र संतुष्टि के उच्च स्तर को दर्शाता है। 
5) तटस्थता वक्र अपने दोनों अक्षों को छूता नहीं है। 


     
        

Monday, November 9, 2020

बजट सेट एवं बजट रेखा

             उपभोक्ता का बजट

   यह किसी उपभोक्ता की क्रय शक्ति को दर्शाता है। बजट की सहायता से एक उपभोक्ता कुछ वस्तुओं की निर्धारित इकाइयों को खरीद सकता है। जिन वस्तुओं की बाज़ार क़ीमत दी गई हो  उपभोक्ता केवल उन्ही वस्तुओं को ख़रीद सकता है। यदि कोई उपभोक्ता अपनी निश्चित आय से दो वस्तुओं को ख़रीदना चाहता है, जिनका बाज़ार मूल्य दिया गया है तो वह ऐसी दो वस्तुओं के केवल उन बंडलों (sets) को ख़रीद सकता है  जिनकी क़ीमत उपभोक्ता की आय से कम हो या फिर उसकी आय के बराबर हो। 
 

                               बजट सेट

उपभोक्ता का बजट सेट उन सभी वस्तुओं के बंडलों का संग्रह है जिन्हें उपभोक्ता विद्यमान बाज़ार क़ीमत पर अपनी आय से ख़रीद सकता है।बजट सेट का समीकरण इस प्रकार है -
    
     

            माना उपभोक्ता की आय M है और वह दो वस्तुएं X तथा Y खरीदना चाहता है। X वस्तु का मूल्य P1 एवं Y वस्तु का मूल्य P2 है  यदि वह X वस्तु की एक इकाई X1 खरीदना चाहता है तो उसे P1X1 धन व्यय करना होगा  और अगर वह Y वस्तु की दो इकाइयां Y2 ख़रीदना चाहता है तो P2Y2 धन खर्च करना पड़ेगा । यदि वह X तथा Y इकाइयों का बंडल ख़रीदना चाहेगा तो P1X1+ P2Y2 धन खर्च करना पड़ेगा जो कि तभी सम्भव है जब उपभोक्ता के पास इतनी धन राशि हो।                      
                                बजट रेखा  ( Budget Line ) 
                                           अथवा 
                                  क़ीमत रेखा (price Line) 
 बजट रेखा दो वस्तुओं के उन सभी संयोगों का रेखाचित्र होता है जिन्हें एक उपभोक्ता दिए गए  बाज़ार मूल्य पर अपनी आय से ख़रीद सकता है। बजट रेखा का दूसरा नाम क़ीमत रेखा भी है। बजट रेखा उन सभी बंडलों का प्रतिनिधित्व करती है जिन उपभोक्ता अपनी पूरी आय खर्च कर सकता है। इस रेखा में दो वस्तुओं के वह सभी बंडल प्रदर्शित होते हैं जिनका मूल्य उपभोक्ता की आय के बराबर होता है। बजट रेखा पर नीचे के बिन्दु उन बंडलों को दर्शाते हैं जिनका मूल्य उपभोक्ता की आय से कम है। 
   बजट रेखा की प्रवणता ऋणात्मक अर्थात नीचे की ओर होती है। यदि  वस्तु की क़ीमत या आय दोनों में से किसी में परिवर्तन होता है तो बजट रेखा में भी बदलाव आ जाता है। 
     बजट रेखा समीकरण है -  
   

    
  रेखाचित्र द्वारा बजट रेखा का स्पष्टीकरण 
          

 चित्र में OX अक्ष पर बर्गर तथा OY अक्ष पर फ्राइज की मात्रा दर्शाई गई है। बिन्दु A पर उपभोक्ता अपनी सम्पूर्ण आय को खर्च करके बर्गर की अधिकतम 20 इकाइयों को खरीद सकता है जबकि बिन्दु D पर उपभोक्ता अपनी समस्त आय फ्राइज पर व्यय करके अधिकतम 30 इकाइयां प्राप्त कर सकता है। A और D के मध्य ऐसे ही कई बिन्दु हैं। इन सभी बिंदुओं को मिलाने से एक सरल रेखा प्राप्त होती है जिसे बजट रेखा या क़ीमत रेखा कहा जाता है। 
       बजट रेखा पर मौजूद सभी बिन्दु बर्गर और फ्राइज के उन सभी बंडलों को दर्शाते हैं जिन्हें उपभोक्ता दोनों वस्तुओं की दी गई क़ीमतों पर अपनी समस्त आय को व्यय करके खरीद सकता है। 

 बजट रेखा में परिवर्तन 

क़ीमत रेखा उपभोक्ता की स्थिर आय तथा वस्तुओं के स्थिर मूल्य के आधार पर बनायी जाती है। यदि वस्तुओं के मूल्य में बदलाव हो या फिर उपभोक्ता की आय में कोई परिवर्तन हो तो बजट रेखा भी खिसक जाती है। 
                  






   
       
        

     

   
  

Friday, November 6, 2020

Total Utility & Marginal Utility

          कुल उपयोगिता 

          Total Utility

            जब हम अपनी किसी आवश्यकता को संतुष्ट करने के लिए एक समय में किसी वस्तु की एक से ज़्यादा इकाइयों का उपभोग करते हैं  तो उन सभी इकाइयों से मिलने वाली उपयोगिता को ही कुल उपयोगिता कहा जाता है अर्थात किसी वस्तु की समस्त इकाइयों से प्राप्त तुष्टिगुण का योग कुल तुष्टिगुण होता है। उदाहरण के लिए - एक व्यक्ति ने 4 सेब खाए, पहले सेब से 40, दूसरे सेब से 30, तीसरे सेब से 20 और चौथे सेब 10 यूटिल्स उपयोगिता मिली तो उसे सेब की समस्त इकाइयों से ( 40 + 30 + 20 + 10 = 100 ) कुल 100 यूटिल्स उपयोगिता  प्राप्त हुई। 
  


  

                    सीमान्त उपयोगिता 

                  Marginal Utility 

           सीमान्त उपयोगिता कुल उपयोगिता में वह परिवर्तन है जो वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से होता है। अर्थात किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई का उपभोग बढ़ाने से कुल उपयोगिता में जो परिवर्तन आता है उसे ही सीमांत उपयोगिता या सीमांत तुष्टिगुण कहा जाता है । उदाहरण के लिए - यदि किसी व्यक्ति ने दो रोटियों का उपभोग किया। पहली रोटी से 60 utils उपयोगिता मिली और दूसरी रोटी का उपभोग करने के बाद यह कुल उपयोगिता बढ़ कर 110 हो जाती है तो दूसरी रोटी की सीमांत उपयोगिता 110 - 60 = 50 utils होगी।  
 

          अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए हम अक्सर हम किसी वस्तु की एक से ज़्यादा इकाइयों का उपभोग करते हैं लेकिन वस्तु की हर बढ़ती हुई इकाई से हमे क्रमशः घटता हुआ तुष्टिगुण मिलता है। इस प्रकार वस्तु की जिस अंतिम इकाई का उपभोग होता है उसे सीमांत इकाई कहते हैं और इस अंतिम इकाई से मिलने वाले तुष्टिगुण को सीमांत तुष्टिगुण । 
    सीमांत तुष्टिगुण के तीन रूप होते हैं — 
    (i) धनात्मक तुष्टिगुण     
   ( ii) शून्य तुष्टिगुण    
    (iii) ऋणात्मक तुष्टिगुण


   
  


       
   
  

   सीमांत उपयोगिता ह्रासमान (क्षीणता ) नियम 

      Law of Diminishing Marginal Utility 

        इस नियम का प्रतिपादन 1854 में गौसेन ने किया और     नियम की विस्तृत व्याख्या प्रो. मार्शल ने की।  इसे 'गोसैन का प्रथम नियम ' भी कहा जाता है । ये एक सार्वभौमिक नियम है इस नियम के अनुसार एक उपभोक्ता एक समय में किसी वस्तु की एक से ज़्यादा इकाइयों का उपभोग करता है तो हर अगली इकाई से उसे घटती हुई सीमांत उपयोगिता मिलती है अर्थात एक समय में किसी वस्तु की अतिरिक्त इकाईयों का उपभोग करने से उन इकाइयों की उपयोगिता कम होने लगती है और अगर उपभोग जारी रखा जाए तो एक ऐसी स्थिति आती है जब किसी प्रकार का तुष्टिगुण नहीं मिलता, इस स्थिति के बाद भी अगर उपभोग बंद न किया जाए तो सीमांत उपयोगिता ऋणात्मक हो जाती है।  उदाहरण के लिए -कोई भूखा व्यक्ति जब रोटी खाता है तो शुरू में उसे कुछ संतुष्टि मिलती है लेकिन जैसे जैसे वह रोटी की अतिरिक्त इकाईयों का उपभोग करता है उसकी भूख मिटने लगती है और संतुष्टि में कमी आने लगती है जब तक पूर्ण संतुष्टि न मिल जाए। 

  सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम की मान्यताएँ 

             Assumptions of law
1- वस्तु की सभी इकाईयां एक जैसी हों अर्थात गुण और आकार में सभी इकाइयां समान होनी चाहिए। 
2- वस्तु की इकाइयों का उपभोग एक ही समय में निरंतर होना चाहिए। 
3- वस्तु के मूल्य में कोई बदलाव नहीं आना चाहिए। 
4- उपभोग के दौरान उपभोक्ता की रुचि, आदत, स्वभाव फ़ैशन तथा आय समान रहने चाहिए ।
5 - उस वस्तु की स्थानापन्न वस्तुओं के मूल्य में भी कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए। 

          सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम के अपवाद 

कुछ ऐसी परिस्थितियां हैं जब सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम लागू नहीं होता इन्हे ही इस नियम का अपवाद माना जाता है जोकि निम्नलिखित हैं - 
1) जब उपभोग की जाने वाली वस्तु की इकाइयां बहुत छोटी हों। 
2) उपभोग की प्रारंभिक अवस्था में भी यह नियम लागू नहीं होता। 
3) मनुष्य की धन प्राप्ति की इच्छा भी धन के साथ बढ़ती है। 
4) दुर्लभ वस्तुओं के संग्रह में भी यह नियम लागू नहीं होता । 
5) रोचक पुस्तक, मधुर गीत एवं कविता के सुनने पर ये नियम लागू नहीं होता है। 
6) नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्ति को भी उसकी अगली इकाई से पहली इकाई से ज़्यादा उपयोगिता प्राप्त होती है । अर्थात मादक वस्तुओं की अतिरिक्त इकाई से व्यक्ति को अधिक संतुष्टि मिलती है।