माँग फलन क्या है?
What is demand function?
एक वस्तु की माँग को कई अलग अलग तत्व निर्धारित करते हैं। जो फलन (function) किसी वस्तु की माँग और उसके निर्धारक तत्वों के मध्य संबंध को दर्शाता है वह माँग फलन कहलाता है। माँग फलन दो प्रकार का होता है –
व्यक्तिगत माँग फलन और बाज़ार माँग फलन
1) व्यक्तिगत माँग फलन (Individual Demand Function) - एक व्यक्ति या उपभोक्ता की माँग को कई अलग अलग तत्व निर्धारित करते हैं व्यक्तिगत माँग फलन इसी संबंध को दर्शाता है। इसे निम्नलिखित तरीक़े़ से व्यक्त किया जाता है –
2) बाज़ार माँग फलन (Market Demand Function) - बाज़ार में किसी वस्तु की कुल माँग को कई अलग अलग तत्व निर्धारित करते हैं बाज़ार माँग का अर्थ है एक बाज़ार में वस्तु की कुल माँग (बाज़ार माँग = कुल व्यक्तिगत माँगों का योग)। किसी वस्तु की बाज़ार माँग तथा उसके विभिन्न निर्धारक तत्वों के मध्य संबंध को बाज़ार माँग फलन व्यक्त करता है।
माँग के निर्धारक तत्व
Determinants of Demand
Influencing/Affecting factors
of Demand
किसी वस्तु की माँग को उसकी क़ीमत के अलावा और भी कई बातें या तत्व प्रभावित करते हैं जो निम्नलिखित हैं —
1) वस्तु की उपयोगिता
(Utility of the goods)
एक निश्चित समय में किसी वस्तु की माँग उस वस्तु की उपयोगिता पर निर्भर होती है। जिस वस्तु में मनुष्य की आवश्यकता पूर्ति की क्षमता अधिक होती है उस वस्तु की माँग भी ज़्यादा होती है और जिस वस्तु की उपयोगिता कम होती है उसकी माँग भी कम की जाती है।
2) आय का स्तर
( Level of income)
उपभोक्ता की आय का माँग पर सीधा असर पड़ता है। जब व्यक्ति की आय अधिक होती है तो वस्तु की माँग बढ़ जाती है इसके विपरीत आय घटने पर माँग भी घट जाती है।
3) धन का वितरण
(Distribution of wealth)
यदि समाज में धन का वितरण असमान है, धन केवल कुछ ही धनी व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित है तो विलासिता की वस्तुओं की माँग अधिक होती है। यदि सरकार कर tax द्वारा या अन्य उपायों से धन के वितरण को समान करने का प्रयास करती है तो समाज में आवश्यक एवं आरामदायक वस्तुओं की माँग बढ़ती है क्योंकि मध्यम और निर्धन वर्ग की आय में वृद्धि हो जाएगी।
4) संबंधित वस्तुओं की क़ीमत
( price of related goods )
संबंधित वस्तुएं दो प्रकार की होती हैं –
a) स्थानापन्न वस्तुएं ( Substitute goods) - ऐसी वस्तुऐंं जिनका उपयोग एक दूसरे के स्थान पर किया जाता है उन्हे स्थानापन्न वस्तुुएं कहा जाता है जैसे चाय काॅफ़ी, ज्वार बाजरा, चना मक्का, चीनी तथा गुड़़ आदि।
b) पूरक वस्तुएं (Complementary goods) - ऐसी वस्तुए उपयोग एक साथ होता है उन्हें पूरक वस्तुएं कहा जाता है जैसे कार - पेट्रोल, स्याही - क़लम, डबल रोटी - मक्खन आदि।
यदि स्थानापन्न वस्तुओं की क़ीमत बढ़ती है तो मुख्य वस्तु की माँग भी बढ़ जाएगी और अगर स्थानापन्न वस्तुएं सस्ती हो जाएं तो मुख्य वस्तु की माँग घट जाएगी। उदाहरण के लिए काॅफ़ी की क़ीमत में वृद्धि होगी तो चाय की माँग ज़्यादा हो जाएगी ।
इसी तरह जब पूरक वस्तुओं का मूल्य कम हो जाता है तो मुख्य वस्तु की माँग बढ़ जाती है और जब पूरक वस्तुओं का मूल्य बढ़ता है तो मुख्य वस्तु की माँग घट जाती है। उदाहरण के लिए मक्खन का मूल्य कम हो तो डबल रोटी की माँग अधिक होगी ।
5) उपभोक्ता की रुचि तथा फ़ैशन (Taste of consumer & Fashion) - जो वस्तुएं वर्तमान फ़ैशन की होती हैं उन वस्तुओं में उपभोक्ताओं की रुचि अधिक होती है और ऐसी वस्तुओं की माँग भी उपभोक्ता अधिक करते हैं। इसके विपरीत जो वस्तुएं फ़ैशन से बाहर हो जाती हैं उनमें उपभोक्ता की रुचि नहीं रहती और ऐसी वस्तुओं की मांग घटने लगती है।
6) मौसम तथा जलवायु ( Weather & Climate) - वस्तुओं की माँग पर मौसम का भी असर पड़ता है। जैसे कूलर, एसी, कोल्ड-ड्रिंक आदि की माँग गर्मी के मौसम में अधिक होती है और गर्मियों की समाप्ति पर उपभोक्ता इन वस्तुओं की मांग कम करते हैं भले ही क़ीमत में छूट दे दी जाए। रूम हीटर, ब्लोवर, कम्बल, गीज़र, इलैक्ट्रिक कैटल आदि वस्तुओं की मांग सर्दियों में बढ़ जाती है।
7)भविष्य में मूल्य परिवर्तन की आशा (Expected future change in price ) - जब उपभोक्ता को यह आशा होती है कि का मूल्य भविष्य में बढ़ सकता है तो वर्तमान समय में भी माँग बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए युुद्ध की संंभावना, सरकारी नीति या दैवीय विपत्ति की आशंका आदि।
8)व्यापार की दशा में परिवर्तन ( Changes in trade conditions) - व्यापार में कभी तेज़ी कभी मंदी की दशा आती रहती है। तेज़ी के समय में लाभ अधिक होने से लोगों की आय बढ़ जाती है और क़़ीमत ज़्यादा होनेे पर भी मांग कम नहीं होती है। मंदी काल में व्यक्तियों की आय कम हो जाती है और वस्तु की क़ीमत घटने पर भी मांग में कमी आती है।
9)जनसंख्या (Population) - यदि किसी देश में जनसंख्या बढ़ रही है तो वस्तुओं की मांग भी बढ़ जाती है और देश की जनसंख्या घटने पर वस्तुओं की मांग भी कम हो जाती है।
10)मुद्रा की मात्रा में परिवर्तन (Change in the quantity of money) - यदि देश में मुद्रा की मात्रा बढ़ जाती है तो उपभोक्ता की क्रय शक्ति भी बढ़ जाती है और वस्तुओं की मांग में वृद्धि होती है। क्रय शक्ति के कम होने पर वस्तुओं की मांग में भी कमी आ जाती है।



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