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Friday, November 6, 2020

Total Utility & Marginal Utility

          कुल उपयोगिता 

          Total Utility

            जब हम अपनी किसी आवश्यकता को संतुष्ट करने के लिए एक समय में किसी वस्तु की एक से ज़्यादा इकाइयों का उपभोग करते हैं  तो उन सभी इकाइयों से मिलने वाली उपयोगिता को ही कुल उपयोगिता कहा जाता है अर्थात किसी वस्तु की समस्त इकाइयों से प्राप्त तुष्टिगुण का योग कुल तुष्टिगुण होता है। उदाहरण के लिए - एक व्यक्ति ने 4 सेब खाए, पहले सेब से 40, दूसरे सेब से 30, तीसरे सेब से 20 और चौथे सेब 10 यूटिल्स उपयोगिता मिली तो उसे सेब की समस्त इकाइयों से ( 40 + 30 + 20 + 10 = 100 ) कुल 100 यूटिल्स उपयोगिता  प्राप्त हुई। 
  


  

                    सीमान्त उपयोगिता 

                  Marginal Utility 

           सीमान्त उपयोगिता कुल उपयोगिता में वह परिवर्तन है जो वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से होता है। अर्थात किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई का उपभोग बढ़ाने से कुल उपयोगिता में जो परिवर्तन आता है उसे ही सीमांत उपयोगिता या सीमांत तुष्टिगुण कहा जाता है । उदाहरण के लिए - यदि किसी व्यक्ति ने दो रोटियों का उपभोग किया। पहली रोटी से 60 utils उपयोगिता मिली और दूसरी रोटी का उपभोग करने के बाद यह कुल उपयोगिता बढ़ कर 110 हो जाती है तो दूसरी रोटी की सीमांत उपयोगिता 110 - 60 = 50 utils होगी।  
 

          अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए हम अक्सर हम किसी वस्तु की एक से ज़्यादा इकाइयों का उपभोग करते हैं लेकिन वस्तु की हर बढ़ती हुई इकाई से हमे क्रमशः घटता हुआ तुष्टिगुण मिलता है। इस प्रकार वस्तु की जिस अंतिम इकाई का उपभोग होता है उसे सीमांत इकाई कहते हैं और इस अंतिम इकाई से मिलने वाले तुष्टिगुण को सीमांत तुष्टिगुण । 
    सीमांत तुष्टिगुण के तीन रूप होते हैं — 
    (i) धनात्मक तुष्टिगुण     
   ( ii) शून्य तुष्टिगुण    
    (iii) ऋणात्मक तुष्टिगुण


   
  


       
   
  

   सीमांत उपयोगिता ह्रासमान (क्षीणता ) नियम 

      Law of Diminishing Marginal Utility 

        इस नियम का प्रतिपादन 1854 में गौसेन ने किया और     नियम की विस्तृत व्याख्या प्रो. मार्शल ने की।  इसे 'गोसैन का प्रथम नियम ' भी कहा जाता है । ये एक सार्वभौमिक नियम है इस नियम के अनुसार एक उपभोक्ता एक समय में किसी वस्तु की एक से ज़्यादा इकाइयों का उपभोग करता है तो हर अगली इकाई से उसे घटती हुई सीमांत उपयोगिता मिलती है अर्थात एक समय में किसी वस्तु की अतिरिक्त इकाईयों का उपभोग करने से उन इकाइयों की उपयोगिता कम होने लगती है और अगर उपभोग जारी रखा जाए तो एक ऐसी स्थिति आती है जब किसी प्रकार का तुष्टिगुण नहीं मिलता, इस स्थिति के बाद भी अगर उपभोग बंद न किया जाए तो सीमांत उपयोगिता ऋणात्मक हो जाती है।  उदाहरण के लिए -कोई भूखा व्यक्ति जब रोटी खाता है तो शुरू में उसे कुछ संतुष्टि मिलती है लेकिन जैसे जैसे वह रोटी की अतिरिक्त इकाईयों का उपभोग करता है उसकी भूख मिटने लगती है और संतुष्टि में कमी आने लगती है जब तक पूर्ण संतुष्टि न मिल जाए। 

  सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम की मान्यताएँ 

             Assumptions of law
1- वस्तु की सभी इकाईयां एक जैसी हों अर्थात गुण और आकार में सभी इकाइयां समान होनी चाहिए। 
2- वस्तु की इकाइयों का उपभोग एक ही समय में निरंतर होना चाहिए। 
3- वस्तु के मूल्य में कोई बदलाव नहीं आना चाहिए। 
4- उपभोग के दौरान उपभोक्ता की रुचि, आदत, स्वभाव फ़ैशन तथा आय समान रहने चाहिए ।
5 - उस वस्तु की स्थानापन्न वस्तुओं के मूल्य में भी कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए। 

          सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम के अपवाद 

कुछ ऐसी परिस्थितियां हैं जब सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम लागू नहीं होता इन्हे ही इस नियम का अपवाद माना जाता है जोकि निम्नलिखित हैं - 
1) जब उपभोग की जाने वाली वस्तु की इकाइयां बहुत छोटी हों। 
2) उपभोग की प्रारंभिक अवस्था में भी यह नियम लागू नहीं होता। 
3) मनुष्य की धन प्राप्ति की इच्छा भी धन के साथ बढ़ती है। 
4) दुर्लभ वस्तुओं के संग्रह में भी यह नियम लागू नहीं होता । 
5) रोचक पुस्तक, मधुर गीत एवं कविता के सुनने पर ये नियम लागू नहीं होता है। 
6) नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्ति को भी उसकी अगली इकाई से पहली इकाई से ज़्यादा उपयोगिता प्राप्त होती है । अर्थात मादक वस्तुओं की अतिरिक्त इकाई से व्यक्ति को अधिक संतुष्टि मिलती है। 
  
 
 

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