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Saturday, January 30, 2021

ANGLE & IT'S TYPES (GEOMETRY)

          

              Angle 

                 & 

    it's Classification


 Vertex :

        The meeting point of two line segments or rays is called vertex.

                                        or 

          The common end point of two line segments or rays is called vertex when the two line segments or rays meet at a point.

    

Fig - 1

Fig - 2


Fig - 3

  ANGLE :

            The inclination  ( झुकाव )  or gapping between two line segments ( or rays) on meeting is called an angle.

     It can be measured in degrees (°). It can be named by its three points with vertex in the middle like

 ABC        PQR

  



Classification:

Angles can be classified as :-    

(1) Acute Angle  

 

(2)Right Angle

                                                            

(3) Obtuse Angle 

                                                             

(4) Straight  Angle

                                                             

(5) Reflex  Angle

                                                             

(6) Complete  Angle

                        

    Acute Angle :-

An angle whose measure is less than 90° is called an acute angle.

      For example; 30°, 65°, 85°, 74°, 12°   

 { 0° < acute angle <90° } 

 


 Right Angle:-

     An angle whose measure is  exact 90°  is called a right angle.

                        or 

       An angle of 90° is called a right angle.

             { right angle = 90° } 

 


 Obtuse Angle:- 

    An angle whose measure is greater than 90° but less than 180° is called an obtuse  angle.

            For example;   130°,  95°, 120°, 170°, 112°, 150°, etc.  

 { 90° <  obtuse angle < 180° }

  


  Straight  Angle:-

  An angle whose measure is  exact 180° is called a straight angle.

                                or 

    An angle of 180° is called a straight angle.  

       { straight angle = 180° }

 


 Reflex  Angle:-

   An angle whose measure is greater than 180°  but  less than 360° is called a reflex angle  

      For example;  195°,  220°, 270°, 300°,  350 ° etc 

 { 180° < reflex angle < 360° }

 


Complete  Angle:- 

    An angle whose measure is  exact 360°  is called a complete angle.

                                or 

    An angle of  360°  is called a complete angle. 

    { complete angle = 360° }

 

Fig - 1

                    

   

Fig - 2

 NOTE:  According to some mathematician , there is an existence of Zero Angle.

 Zero Angle:-

 When there is no gapping between two line segments then the angle is called zero degree.


Summary of different angles 


Wednesday, January 27, 2021

नज़रिया वो भी पराया

नज़रिया

अजीब सी बात है किसी का इस्तेमाल किया गया सामान हम इस्तेमाल नहीं करना चाहते... हर जगह, हर बात में, हर तरह से दूसरों से ख़ुद को अलग देखना पसंद करते हैं वो बात कहना पसंद नहीं करते जो पहले कई बार कही जा चुकी हो...यानि कुछ भी ऐसा जो पहले किसी और का रहा हो उसे अपना कहना हम गवारा ही करते, लेकिन ताज्जुब की बात है और अफ़सोस की भी कि हम दूसरों के नज़रिए को आख़िर क्यूँ अपना लेते हैं? क्यूँ किसी इन्सान को उसी नज़र से देखते हैं जिससे सब देखते हैं? क्यूँ किसी के बारे में कही गई बातों पर बड़ी आसानी से यक़ीन कर लेते हैं? क्यूँ किसी से मिले बग़ैर, जाने बिना ही उसे जानने की कोशिश करते हैं?  हम इतने नासमझ क्यूँ बन जाते हैं कि दूसरों की अक़्ल को अपनी अक़्ल से ज़्यादा समझ लेते हैं और उन्हें ख़ुद से ज़्यादा समझदार मान लेते हैं? जबकि बाक़ी मामलों में हम अपने आप को ही दुनिया का सबसे समझदार और तजुर्बेकार इंसान समझने की भूल कर जाते हैं. ! जी हाँ ये भूल ही तो है जो हम से बार बार होती है और हर बार हम को एक नया सबक़ सिखाती है फिर भी सीखना कौन चाहता है .! इतनी आदत हो गई है हमको दूसरों के नज़रिए को इस्तेमाल करने की...... कि हम किसी इंसान को या हालात को ख़ुद की नज़र से देखना ही नहीं चाहते वहीं दूसरी तरफ किसी इंसान के लिए हम जो राय क़ायम कर लेते हैं उसी पर क़ायम रहना चाहते हैं!!! ये वाक़ई ग़ौर करने की बात है और करना भी चाहिए नहीं तो हम कभी भी एक सही नज़रिया अपना नहीं पाएंगे। कहीं पर ग़लतफहमी का शिकार बने रहेंगे और कहीं झूठ के पर्दे के पीछे छुपे सच को पहचान नहीं पाएंगे। दोनों ही हालात में नुक़सान हमारा ही है, धोखा हम ही खाएंगे.... सही इन्सान को ग़लत समझ कर और दूसरों के ग़लत नज़रिए को सच मान कर .........!!! अब फैसला आपको ख़ुद करना होगा कि ग़लत फहमी में जीना है या सच को पहचानने की कोशिश करनी है। ज़िंदगी में ऐसे मौक़े बार बार आयेंगे और आपका इम्तेहान लेंगे इसलिए तैयारी अभी से शुरू कर दीजिए। 

एक मशहूर शायर का शेर याद आ रहा है जोकि पेश ए ख़िदमत है —
ले दे के अपने पास फ़क़त एक नज़र तो है 
क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम 
  










Wednesday, January 20, 2021

पूर्ति का नियम LAW OF SUPPLY 12th Economics

      पूर्ति का नियम

 LAW OF SUPPLY

पूर्ति का नियम वस्तु की क़ीमत और उसकी पूर्ति के बीच धनात्मक संबंध(positive relation) को दर्शाता है। यदि अन्य बातें समान रहें तो वस्तु का मूल्य बढ़ने के साथ ही उसकी पूर्ति भी बढ़ा दी जाती है और वस्तु का मूल्य कम हो जाने पर उसकी पूर्ति भी घट जाती है। इस तरह किसी वस्तु के मूल्य एवं उसकी पूर्ति में सीधा संबंध होता है । ध्यान रहे कि पूर्ति का नियम केवल पूर्ति की मात्रा में आने वाले परिवर्तनों की दिशा की तरफ संकेत करता है ।
सूत्र के रूप में इसे इस तरह व्यक्त किया जा सकता है –
                     S = f ( p)
यहां :
s = वस्तु की पूर्ति 
p = वस्तु की क़ीमत
f = फलनात्मक सम्बन्ध


         पूर्ति के नियम की मान्यताएं 

Assumptions of Law of Supply 

1) वस्तु विशेष के उत्पादन साधनों की क़ीमत एवं पूर्ति दोनों स्थिर रहनी चाहिए। 

2) फ़र्म के उद्देश्य में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए। 

3) वस्तु की उत्पादन तकनीक में कोई बदलाव नहीं आना चाहिए। 

4) संबंधित वस्तुओं के मूल्यों में परिवर्तन नहीं होना चाहिए ।

5) क्रेता एवं विक्रेता की रुचि में कोई बदलाव नहीं आना चाहिए। 

6) सरकारी नीतियों जैसे कर आदि में परिवर्तन नहीं होना चाहिए। 

तालिका एवं रेखाचित्र द्वारा पूर्ति के नियम का स्पष्टीकरण 


  

उपरोक्त रेखाचित्र में पूर्ति वक्र बायें से दायें ऊपर की तरफ उठ रहा है जोकि वस्तु की मात्रा और उसके मूल्य के मध्य धनात्मक संबंध को व्यक्त कर रहा है। वक्र से स्पष्ट है कि मूल्य में वृद्धि होने पर वस्तु की पूर्ति की मात्रा भी बढ़ रही है। 

पूर्ति के नियम के अपवाद 

Exceptions of the Law of Supply 

कुछ वस्तुओं पर पूर्ति का नियम लागू नहीं होता है इसका अर्थ यह है कि वस्तु का मूल्य बढ़ जाने पर भी उसकी पूर्ति की मात्रा नहीं बढ़ती । इसी तरह वस्तु का मूल्य घटने पर उसकी पूर्ति की मात्रा में कमी नहीं आती है। ऐसी वस्तुएँ निम्नलिखित हैं – 
1)कृषि उत्पाद (Agricultural Goods)– कृषि उत्पाद प्राकृतिक कारणों से प्रभावित होते हैं यदि इन वस्तुओं की क़ीमत बढ़ जाए तो भी पूर्ति बढ़ाना सम्भव नहीं होता है। अगर मौसम ख़राब हो जाने के कारण फसल का नुक़सान हो गया हो तो ऐसी स्थिति में भी पूूर्ति की मात्रा को बढ़ाया नहीं जा सकता है इसलिए कृषि उत्पादों पर पूर्ति का नियम लागू नहीं होता है। 

2) नाशवान वस्तुएं ( Perishable Goods) – जिन वस्तुओं को ज़्यादा दिनों तक नहीं रखा जा सकता यानि जो वस्तुएंं जल्दी ख़राब हो जाती हैं उन्हें विक्रेता कम मूल्य पर भी बेचना चाहते हैं। फल, सब्ज़ी और दूध आदि ऐसी ही वस्तुएंं हैं जिनके मूल्य में बदलाव आने पर भी उनकी पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन नहीं होता है।  

3) दुर्लभ वस्तुएंं( Antique Goods) – एंटीक वस्तुुओं की पूर्ति सीमित होती है क्योंकि यह वस्तुएं काफ़ी कम मात्रा में उपलब्ध हैं। इन वस्तुुओं के मूल्य बहुत अधिक होते हैं फिर भी इनकी पूर्ति की मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता है।  

पूर्ति वक्र में संचलन / पूर्ति की गयी मात्रा में बदलाव 

Movement Along the Supply Curve 
जब किसी वस्तु की पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन उस वस्तु के मूल्य में बदलाव आने के कारण होता है तो इसे पूर्ति वक्र में संचलन कहते हैं पूर्ति वक्र में संचलन की स्थिति में अन्य बातें समान रहती हैं अर्थात पूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य कारक अपरिवर्तित रहते हैं। संचलन में पूर्ति वक्र अपने स्थान पर ही रहता है उसी पर मूल्य के अनुसार पूर्ति की मात्रा ऊपर नीचे खिसक जाती है। ये संचलन दो प्रकार का हो सकता है- विस्तार (Expansion) एवं संकुचन (Contraction) 

1) पूर्ति का विस्तार (Expansion of Supply) – जब किसी वस्तु का मूूल्य बढ़ने के साथ ही उसकी पूर्ति  की मात्रा में भी वृद्धि हो जाती है तो यह पूर्ति का विस्तार है। इसमें पूर्ति वक्र पर दाहिनी तरफ (rightward) संचलन होता है। 

 

 रेखाचित्र में OX अक्ष पर वस्तु की पूर्ति को तथा OY अक्ष पर वस्तु की क़ीमत को दिखाया गया है। SS पूर्ति वक्र है। रेखाचित्र से स्पष्ट है कि जब वस्तु का मूल्य OP है तो वस्तु की पूर्ति OQ है। जब वस्तु का मूल्य बढ़कर OP₁ हुआ तो उसकी पूर्ति भी OQ से बढ़कर OQ₁ हो गयी है। E से E₁ तक या Q से Q₁ तक पूर्ति की मात्रा में वृद्धि है और यही पूर्ति का विस्तार है। 

2) पूर्ति का संकुचन (Contraction of Supply) –  जब वस्तु की क़ीमत कम हो जाने पर उसकी पूर्ति की मात्रा में भी कमी आ जाती है तो यह पूर्ति का संकुचन है। इसमें पूर्ति वक्र पर बांयी तरफ (Leftward) संचलन होता है। 

 

रेखाचित्र में OX अक्ष पर वस्तु की पूर्ति को तथा OY अक्ष पर वस्तु की क़ीमत को दिखाया गया है। SS पूर्ति वक्र है।  रेखाचित्र से स्पष्ट है कि जब वस्तु का मूल्य OP है तो वस्तु की पूर्ति OQ है। जब वस्तु का मूल्य घटकर OP₁ हुआ तो उसकी पूर्ति भी OQ से घटकर OQ₁ हो गयी है। E से E₁ तक या Q से Q₁ तक पूर्ति की मात्रा में कमी है और यही पूर्ति का संकुचन है। 



पूर्ति वक्र में खिसकाव/पूर्ति में बदलाव 
     Shift in Supply Curve 

जब किसी वस्तु का मूल्य स्थिर रहे फिर भी उस वस्तु की पूर्ति में कमी आ जाए या पूर्ति में वृद्धि हो जाये तो इसे पूर्ति वक्र में खिसकाव की स्थिति कहा जाता है। पूर्ति वक्र में खिसकाव अन्य कारकों में बदलाव आने के कारण होता है। इस अवस्था में पूर्ति वक्र अपने स्थान से बायीं या दाहिनी तरफ खिसक जाता है। यदि पूर्ति में वृद्धि होती है तो पूर्ति वक्र दाहिनी तरफ खिसक जाता है और अगर पूर्ति में कमी आती है तो पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जाता है। 
जिन कारकों की वजह से पूर्ति वक्र में बदलाव आता है वह निम्नलिखित हैं –
1) संबंधित वस्तुओं की क़ीमत 
2) तकनीकी स्तर 
3) उत्पादन लागत 
4) सरकारी कर प्रणाली 
5) उद्योग में फ़र्मों की संख्या 
6) फ़र्मों का उद्देश्य    आदि 
यही कारक हैं जिनसे पूर्ति में बदलाव आता है और एक नया पूर्ति वक्र बन जाता है। पूर्ति में बदलाव की दो स्थितियां होती हैं पूर्ति में वृद्धि एवं पूर्ति में कमी। 
1) पूर्ति में वृद्धि ( Increase in Supply) – जब वस्तु का मूल्य न बदले लेकिन वस्तु की पूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य घटकों में परिवर्तन आया हो और इस परिवर्तन से वस्तु की पूर्ति बढ़ जाये तो इसे पूर्ति में वृद्धि कहा जाता है।पूर्ति में वृद्धि के निम्नलिखित कारक हैं –
i) वैकल्पिक या स्थानापन्न वस्तु के मूल्य       में गिरावट 
ii) पूरक वस्तु के मूल्य में वृद्धि 
iii) उत्पत्ति के साधनों के मूल्य में कमी 
iv) उत्पादन की तकनीक में सुधार 
v) उद्योग में फ़र्मों की संख्या में वृद्धि 
vi) सरकारी कर नीति में बदलाव। यदि कर का मूल्य कम हो जाये और सरकारी अनुदान में वृद्धि हो जाये। 
vii) उत्पादक के उद्देश्य में परिवर्तन। यदि वह अधिकतम लाभ के बजाय अधिकतम विक्रय का उद्देश्य अपना ले।

       पूर्ति में वृद्धि का रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
 

रेखाचित्र से स्पष्ट है कि वस्तु के मूल्य में कोई बदलाव नहीं आया है लेकिन पूर्ति 100 से बढ़कर 150 इकाइयों पर पहुंच गई है। पूर्ति वक्र SS से S₁S₁ पर शिफ्ट हो गया है अर्थात अपने स्थान से दाहिनी तरफ (rightward) खिसक गया है।

 
 2) पूर्ति में कमी (Decrease   
in Supply) –जब वस्तु का मूल्य न बदले लेकिन वस्तु की पूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य घटकों में परिवर्तन आया हो और इस परिवर्तन से वस्तु की पूर्ति  कम हो जाये तो इसे पूर्ति में कमी कहा जाता है। पूर्ति में कमी के निम्नलिखित कारक हैं –
i) ) वैकल्पिक या स्थानापन्न वस्तु के    मूल्य में वृद्धि 
ii) पूरक वस्तु के मूल्य में कमी
iii) उत्पत्ति के साधनों के मूल्य में वृद्धि
iv) उत्पादन की तकनीक में गिरावट 
v) उद्योग में फ़र्मों की संख्या में कमी 
vi) सरकारी कर नीति में बदलाव। यदि कर का मूल्य बढ़ जाये और सरकारी अनुदान में कमी आई हो। 
vii) उत्पादक के उद्देश्य में परिवर्तन। यदि वह अधिकतम विक्रय के बजाय अधिकतम लाभ का उद्देश्य अपना ले।

        पूर्ति में कमी का रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण 
 
 



रेखाचित्र से स्पष्ट है कि वस्तु के मूल्य में कोई बदलाव नहीं आया है लेकिन पूर्ति 150 से घटकर 100 इकाइयों पर पहुंच गई है। पूर्ति वक्र SS से S₁S₁ पर शिफ्ट हो गया है अर्थात अपने स्थान से बायीं तरफ (leftward) खिसक गया है।


 


Saturday, January 16, 2021

HOME NURSING 9TH HOME SCIENCE

      Home Nursing

      


To look after a person after long treatment is very important. A person can recover very quickly with proper care at home. This proper care of a patient at home is called Home Nursing. It means home nursing is the care of sick person at home.A
home nurse take care of patient and follows the instructions of the doctor regarding to the condition of a person. 
 

Importance of Home Nursing

Home Nursing plays an important role in the quick recovery of a patient who is discharged from the hospital after a long treatment. A person can gain good health very soon with the help of proper care. Medicines are only remedy and will be very useful but it is necessary that all the medicines should be given to the patient
punctually. 

 Qualities of A nurse 

 


The qualities of an ideal nurse are given below :

1) Good Health - A nurse performs all the necessary duties towards the patient. Sometimes she awakes whole night to look after a patient so she must be healthy. 

2) Polite and Sympathetic -A home nurse should be soft spoken and polite. She should have sympathy for the patient. She should treat the patient with smiling face. Her smile can give happiness and encourage a patient to feel better. 
  



3) Keen Observer - A nurse should be good observer so that she may notice the changes occur in the condition of a patient. This quality helps her to provide current and exact information to the doctor. 

4) Good Memory - A nurse should have strong and sharp memory. Good memory always helps in doing all the work for the patient at the right time. She can give medicines without any delay, she can remember the instructions of the doctor and follows easily. 

5) Knowledge of Cleanliness & Hygiene - A home nurse can perform her duties in a better way if she has complete knowledge of health care and hygiene. She can keep the patient clean if she knows the method of sponge bath, patient's bed organisation and sterilization of the utensils etc. 

6) Ideal Cook - A home nurse should be expert in cooking. She should have the knowledge of different nutrients and their benefits. A nurse who is ideal cook can prepare the nutritious and delicious food for the patient. 

7) Economical -  A home nurse should use everything economically. She doesn't have a habit of wasting anything or use anything more than required. She can save money also if she is economical. 

8) Sincere - A home nurse should be very sincere towards her duties. She should serve the patient by heart and sincerely. Proper care provided by a nurse can improve the condition of a patient very quickly.  




Functions & Duties      of a home nurse 

Some important duties or functions of a home nurse are as follows –

1) To give medicines to the patient punctually. 

2) To prepare fever chart if needed. 

3) To examine pulse rate and heart beat of the patient regularly and note down carefully. 

4) To cook food for the patient as directed by the doctor. 

5) Inform the doctor about the current condition of the patient time to time. 

6) To make the patient happy for quick recovery. 

7) To deal with the patient politely and in sympathetic way. 

8) To keep the patient in calm and quiet surroundings. 

9) Avoid any type of noise & crowd near the room of the patient. 

10) To keep the bed of the patient clean, to change the bed sheet and pillow covers regularly. 

11) A home nurse shouldn't allow anyone to sit on patient's bed. 

12) To give sponge bath, cold and warm fomentation to thepatient time to time. 

13) To clean mouth, tongue and teeth of the patient if the person is unable to do that. 

14) Arrange washed and ironed wearing clothes for the patient. 

15) To keep herself alert to look after the patient. 

16) She shouldn't leave the patient alone even during a sleep. 

17) Proper sanitary arrangement of the patient's room, utensils and other patient's requirements of excretion, coughing etc. 

18) Proper arrangement of food and rest or sleep. 

19) To spend some time with the patient, talk to him also as the patient does not feel  loneliness. 

20) Do not give any bad news to the patient. Avoid whispering in front of the patient. 

A person who is ill for a long time or injured badly can recover very quickly with proper care and regular treatment. A home nurse can give a new life to the patient by performing her duties sincerely. 




Tuesday, January 12, 2021

LINE, LINE SEGMENT & RAY

-: GEOMETRY :-

 

Geometry is a branch of Mathematics that deals with points, lines ,plains etc. which can be used for the measurement on Earth .

The word Geometry is derived from two words :-  

 1- "Geo"   means Earth

2- "Metron"  means measurement.

POINTS:-

         A point is an exact location which can be represented by a dot. It can be named by the capital letters of English alphabets  like –

Point  "A "  , Point " B " ,  Point " M " ,  Point  " Q "  etc. 

 

                              . A                              .  M

                

                                . Q

A line or curve  can be drawn when we join points .

LINE :-

     A line is an endless straight path that extends in both directions.

     It has length but don't have breadth or thickness. It does not has any fixed length.

     It has no end point.

     It has infinite number of points. 

     It can be named by any two points on it like  line  AB ,   line PQ   ,  line  MN   etc


Line AB



RAY :-

     A ray is a part of a line that extends in one direction only.

      It is a part of a line with  one end point.

     It has length but don't have breadth or thickness. It does not has any fixed length.

     It has one end point.

     It has infinite number of points. 

     It can be named by it's one end point and any other  point on it like  ray AB,  ray PQ  ,  ray  MN   etc





LINE SEGMENT :-

      A line segment  is a part of a line that does not  extend in any direction .

      It is a part of a line or ray with  two end points.

     It has length but don't have breadth or thickness.  has a fixed length.

     It has two end points.

     It has infinite number of points. 

     It can be named by it's two end points only  like  line segment  " AB",    line segment  " PQ " ,    

     line   segment  " MN "    etc


Line Segment AB












 

Monday, January 11, 2021

आपूर्ति की अवधारणा Supply 12th Economics

 पूर्ति का अर्थ एवं परिभाषा

Meaning&Definition 

        of Supply

पूर्ति किसी वस्तु की वह मात्रा है जिसे एक फर्म या उत्पादक एक निश्चित समयावधि में तय की गई क़ीमत पर बेचने के लिए तैयार हो जाता है। जबकि वस्तु की बिक्री और उसकी पूर्ति दोनों एक दूसरे से अलग-अलग हैं। पूर्ति किसी वस्तु की वह मात्रा है जो एक विक्रेता बेचना चाहता है न कि वह मात्रा जिसे वह वास्तव में बेचता है। वस्तु का स्टाॅक किसी विक्रेता के पास उपलब्ध वस्तु की कुल मात्रा को कहते हैं जिसे वह वर्तमान या भविष्य में विक्रय कर सकता है। 
माना कि फर्म 'लिबर्टी' के पास 2000 लेडीज़ शूज़ तैयार हैं तो यह फर्म का स्टाॅक  है । बाज़ार में लेडीज़ शूज़ की क़ीमत 500 रुपये है,इस क़ीमत पर फर्म 1000 लेडीज़ शूज़ बेचने के लिए तैयार है तो फर्म की पूर्ति 1000 लेडीज़ शूज़ हुई। यदि 500 रुपये के हिसाब से फर्म 'लिबर्टी' 1000 लेडीज़ शूज़ विक्रय करती है तो यह उसकी बिक्री हुई। 
इसी तरह यदि एक किसान 500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से 50 क्विंटल चावल फरवरी माह में बेचना चाहता है तो चावल की 50 क्विंटल मात्रा ही चावल की पूर्ति कहलाती है माना कि वही किसान फरवरी माह सिर्फ़ 30 क्विंटल चावल की बिक्री कर पाता है तो 30 क्विंटल चावल की मात्रा चावल की बिक्री हुई ।
वस्तु की वह मात्रा जो किसी समय विशेष में बाज़ार में उपलब्ध होती है वस्तु का स्टाॅक कहलाती है। 
अगर सिर्फ़ ये कहा जाए कि बाज़ार में चावल की पूर्ति 1000 क्विंटल की है तो यह कथन ग़लत है क्योंकि चावल की क़ीमत तथा समय नहीं बताया जा रहा है। अब अगर इस तरह कहा जाए कि आज बाज़ार में 50 रुपये प्रति किलो के मूल्य पर चावल की पूर्ति 1000 क्विंटल की है तो यह कथन सही है। 
स्पष्ट है कि आपूर्ति के लिए निश्चित समय एवं निश्चित क़ीमत दोनों का बताना ज़रूरी है । 
प्रो. बेन्हम — " पूर्ति का आशय वस्तु की उस मात्रा से है जिसे प्रति इकाई समय में बेचने के लिए प्रस्तुत किया जाता है।" 

              पूर्ति के प्रकार 
        Types of Supply 
पूर्ति के प्रकार निम्नलिखित हैं –
1)व्यक्तिगत पूर्ति
(Individual Supply) – किसी वस्तु की वह मात्रा जिसकी पूर्ति एक व्यक्तिगत फर्म के द्वारा किसी निश्चित समय पर विभिन्न मूल्यों पर की जाती है उसे व्यक्तिगत पूर्ति कहते हैं। जैसे- फर्म सेलो द्वारा जनवरी माह में 20,000 फ्लास्क की पूर्ति की गयी। 
   
2) बाज़ार पूर्ति (Market Supply) –  विभिन्न क़ीमतों पर किसी समय विशेष में सभी उत्पादकों या फर्मों द्वारा बाज़ार में किसी वस्तु की बिक्री के लिए जो मात्रा उपलब्ध करवायी जाती है उस मात्रा के योग को बाज़ार पूर्ति (Market Supply) कहते हैं। जैसे - सभी फर्मों द्वारा जनवरी माह में 80,000 फ्लास्क की पूर्ति की गयी। बाज़ार पूर्ति सभी फर्मों की पूर्ति का योग होता है। 


       पूर्ति अनुसूची या तालिका
        Supply Schedule 
एक विक्रेता बाज़ार में विभिन्न मूल्यों पर वस्तु की भिन्न-भिन्न मात्राओं को बेचना चाहता है। पूर्ति अनुसूची यह बताती है कि एक विक्रेता विभिन्न मूल्यों पर वस्तु की  कितनी मात्रा बेचना चाहता है। पूर्ति अनुसूची में वस्तु की उन सभी मात्राओं को
और उनके अलग-अलग मूल्यों को दर्शाया जाता है। यह तालिका वस्तु की क़ीमत एवं पूर्ति की जाने वाली मात्रा में धनात्मक संबंध ( positive relation) को प्रदर्शित करती है ।
माँग तालिका की तरह पूर्ति तालिका भी दो प्रकार की होती है —
1) व्यक्तिगत पूर्ति तालिका
   Individual Supply Schedule 
2) बाज़ार पूर्ति तालिका
    Market Supply Schedule


1) व्यक्तिगत पूर्ति तालिका
(Individual Supply Schedule) – यह तालिका किसी व्यक्तिगत विक्रेता की विभिन्न अनुमानित क़ीमतों और उन पर पूर्ति की जाने वाली वस्तु की अलग-अलग मात्राओं को प्रदर्शित करती है अर्थात इस तालिका से ज्ञात होता है कि एक विक्रेता विभिन्न मूल्यों पर वस्तु की कितनी मात्रा बेचना चाहता है। 

      

तालिका से स्पष्ट है कि मूल्य में वृद्धि होने पर वस्तु की पूर्ति की जा रही मात्रा में भी वृद्धि हो रही है। 


2) बाज़ार पूर्ति तालिका (Market Supply Schedule) – किसी भी बाज़ार में विक्रेताओं की संख्या एक से अधिक ही होती है और ये सभी विक्रेता किसी समय विशेष में अलग-अलग मूल्यों पर वस्तु की अलग-अलग मात्राओं की पूर्ति करना चाहते हैं। यदि इन सब विक्रेताओं की पूर्ति को जोड़ दिया जाये तो बाज़ार पूर्ति तालिका तैयार हो जायेगी। 

  


   

पूर्ति वक्र या पूर्ति रेखा 

Supply Curve

जब पूर्ति तालिका को रेखाचित्र के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो इससे हमें पूर्ति वक्र प्राप्त होता है जो कि पूर्ति अनुसूची काDiagrammaticPresentation है। पूर्ति वक्र का ढाल धनात्मक होता है। पूर्ति वक्र भी दो प्रकार का होता है –
1) व्यक्तिगत पूर्ति वक्र 
(Individual Supply Curve)
2) बाज़ार पूर्ति वक्र 
(Market Supply Curve)



1) व्यक्तिगत पूर्ति वक्र 
(Individual Supply Curve)–
 व्यक्तिगत फ़र्म की पूर्ति अनुसूची को जब रेखाचित्र के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो व्यक्तिगत पूर्ति वक्र प्राप्त होता है।पूर्ति रेखा बाएँ से दाएँ ऊपर की ओर बढ़ती है।

 
व्यक्तिगत पूर्ति वक्र 


पूर्ति वक्र की धनात्मक ढाल वस्तु के मूल्य और पूर्ति की गयी मात्राओं के बीच प्रत्यक्ष
सम्बन्ध को दर्शाता है। 


2) बाज़ार पूर्ति वक्र 
(Market Supply Curve) बाज़ार में शामिल सभी फ़र्मों की पूर्ति तालिका के चित्रात्मकपप्रदर्शन को बाज़ार पूर्ति वक्र कहते हैं यह रेखा भी बाएँ से दाएँ ऊपर की ओर बढ़ती है।

 



पूर्ति के निर्धारक तत्व 

Determining Factors of Supply 

 किसी वस्तु की पूर्ति को विभिन्न घटक निर्धारित करते हैं जिनमें से कुछ प्रत्यक्ष रूप से और कुछ अप्रत्यक्ष रूप से पूर्ति को प्रभावित करते हैं। पूर्ति को प्रभावित करने वाले मुख्य तत्व या घटक निम्नलिखित हैं –

1) वस्तु का मूल्य ( price of commodity) – किसी वस्तु के मूल्य एवं उसकी आपूर्ति में प्रत्यक्ष संबंध होता है मूल्य बढ़ने के साथ आपूर्ति बढ़ती है और मूल्य में कमी आने पर आपूर्ति भी कम हो जाती है। 

2)सम्बंधित वस्तुओं का मूल्य (Price of Related Goods) – किसी वस्तु की आपूर्ति उसकी सम्बंधित वस्तुओं की क़ीमत पर निर्भर करती है। किसी वस्तु की दो प्रकार की सम्बंधित वस्तुएं होती हैं स्थानापन्न तथा पूरक । दोनों प्रकार की वस्तुओं के मूल्य में आने वाला बदलाव वस्तु की आपूर्ति पर प्रभाव अवश्य डालता है। 
i) स्थानापन्न या वैकल्पिक वस्तु (Substitute) – जिन वस्तुओं को मुख्य वस्तु के स्थान पर उपयोग में लाया जा सकता है उन्हें स्थानापन्न या वैकल्पिक वस्तु कहा जाता है। जैसे पेप्सी, कोका कोला, माउंटेन ड्यू तथा चाय एवं
कॉफी आदि। यदि वैकल्पिक वस्तु की क़ीमत बढ़ती है तो उत्पादक वैकल्पिक वस्तु का उत्पादन बढ़ा देते हैं जिससे ज़्यादा लाभ हासिल कर सकें इस तरह मुख्य वस्तु की पूर्ति प्रभावित होती है।
ii) पूरक वस्तु (Complementary) –
जिन वस्तुओं का उपयोग एक दूसरे के साथ किया जाता है उन्हें पूरक वस्तु कहते हैं जैसे पेट्रोल और कार। पूरक वस्तुओं की क़ीमत में परिवर्तन का मुख्य वस्तु की पूर्ति पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। यदि कार का मूल्य बढ़ेगा तो पेट्रोल की पूर्ति भी बढ़ जाएगी क्योंकि कार का मूल्य बढ़ने से कार की पूर्ति में वृद्धि होगी और अधिक कारों के लिए पेट्रोल की भी अधिक मात्रा की आवश्यकता होगी इस तरह पेट्रोल की पूर्ति भी बढ़ जाएगी। 

3) उत्पादन के साधनों का मूल्य (Price of Factors of Production) – उत्पत्ति के साधनों का मूल्य बढ़ने पर उत्पादन पर आने वाली लागत भी बढ़ जाती है जिससे उत्पादक को मिलने वाला लाभ कम हो जाता है  फलस्वरूप वस्तु की पूर्ति कम हो जाएगी
लेकिन वस्तु का मूल्य भी बढ़ गया हो तो फिर पूर्ति पर साधनों का मूल्य बढ़ने का प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि उत्पादक को मिलने वाला लाभ भी बढ़ जाएगा 

4) फ़र्म का उद्देश्य (Goal of the Firm) –  किसी वस्तु की पूर्ति इस बात पर भी निर्भर करती है कि उत्पादक किस उद्देश्य के लिए वस्तु को विक्रय करना चाहता है अगर वह बाज़ार में अपना अधिकार जमाना चाहता है तो फिर कम लाभ मिलने पर भी वह पूर्ति ज़्यादा से ज़्यादा करेगा। यदि फ़र्म केवल अधिकतम लाभ कमाना चाहती है तो वह वस्तु की पूर्ति तभी करेगी जब बाज़ार में वस्तु की क़ीमत ज़्यादा होगी। 

5)तकनीकी स्तर (Level of Technique) – नई तकनीक के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि होती है और उत्पादन लागत घटती है साथ ही उत्पादक को मिलने वाला लाभ भी बढ़ जाता है इसी वजह से वस्तुु की पूर्ति में वृद्धि होती है। अगर आधुनिक तकनीक का प्रयोग न किया जाए तो वस्तुु की पूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़़ता है। 

6) सरकार की कर - नीति  
( Government policy) – यदि सरकार किसी वस्तुु के उत्पाद कर को कम करती है तो उस वस्तुु के उत्पादन में आने वाली लागत भी कम हो जाती है जिससे उत्पादक वस्तुु का उत्पादन बढ़ा देंगे फलस्वरुप पूर्ति भी बढ़ जाएगी। दूसरी तरफ यदि सरकार किसी वस्तु पर अधिक कर लगाती है तो वस्तु की उत्पादन लागत बढ़ जाती है एंव उत्पादक को लाभ कम प्राप्त होता है ।जिन वस्तुओं पर अधिक कर लगाया जाता है उनकी  पूर्ति पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़़ता है और पूर्ति
कम होने लगती है। 

7) व्यावसायिक आशा ( Business Expectations) – यदि भविष्य में किसी वस्तुु के मूल्य बढ़ जाने की उम्मीद होगी तो वर्तमान में उस वस्तुु की पूर्ति उत्पादक कम कर देंगे और उसे स्टाॅक कर लेंगे जिससे भविष्य में बढ़ी हुई क़ीमत पर वस्तुु को बेच कर अधिक लाभ प्राप्त कर सकें।                    

Saturday, January 9, 2021

अपनी पहचान ज़माने में जुदा ही रखना

 राह अँधेरी ही सही दिल में उजाले रखना

फरेब ए तबस्सुम से ग़मों को टाले रखना

               अपनी पहचान ज़माने से जुदा ही रखना

               इसलिए पलकों पर कुछ ख़्वाब निराले रखना

नफरतों की धूप है और कोई भी साया नहीं 

प्यार से ही फ़क़त प्यार को संभाले रखना

                   दिल में ख़ामोशियों का शोर हो तो होने दे 

            क्योंकि लाज़िम है अब अल्फाज़ पे ताले रखना

  

                



aabgina @ yourquote 

Monday, January 4, 2021

पैमाने के प्रतिफल Returns to Scale 12th Economics

उत्पादन फलन Production Function

उत्पादन का उसके साधनों के साथ क्रियात्मक संबंध होता है यानि जब उत्पत्ति के कारकों में वृद्धि की जाती है तो परिणामस्वरूप उत्पादन में भी वृद्धि होती है एवं जब उत्पत्ति के कारकों में कमी की जाती है तो उत्पादन में भी कमी आती है। उत्पादन फलन उत्पादनों (Outputs) तथा उपादानों(Inputs) के मध्य फलनात्मक अथवा क्रियात्मक संबंध को दर्शाता है। उत्पादन फलन से ही हमें ये पता चलता है कि एक निश्चित समय में उत्पादन के साधनों में बदलाव लाकर उत्पादन के आकार में किस तरह और कितनी मात्रा में परिवर्तन होता है। इसे इस प्रकार लिखा जा सकता है 

                      Q = f ( L,K) 
यहाँ Q उत्पादन की मात्रा है 
f फलन है जो यह बताता है कि उत्पादन की मात्रा L (श्रम) और K (पूँजी) पर निर्भर करती है। श्रम और पूँजी को उत्पादन का मुख्य कारक माना जाता है। 
एक उत्पादन फलन जब दूसरे कारक (पूँजी) को स्थिर रख कर सिर्फ़ एक कारक (श्रम) में परिवर्तन के कारण उत्पादन में होने वाले परिवर्तन को बताता है तो यह अल्पकालीन उत्पादन फलन कहलाता है। अल्पकालीन उत्पादन फलन के सिद्धांत को परिवर्ती अनुपातों का नियम और कारक के प्रतिफल का नियम भी कहा जाता है क्योंकि अल्पकाल में केवल एक ही कारक (श्रम) को ही परिवर्तनशील साधन समझा जाता है अतः इसी में परिवर्तन के द्वारा उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन किया जाता है उत्पादन के पूरे पैमाने को बदला नहीं जा सकता है क्योंकि अल्पकाल में पूँजी को स्थिर साधन माना जाता है। 
    दीर्घकालीन उत्पादन फलन उत्पादन पर पड़ने वाले उस प्रभाव को बताता है जब उत्पत्ति के सभी कारकों को एक साथ और एक ही अनुपात में परिवर्तित किया जा सकता है।दीर्घकालीन उत्पादन फलन का सिद्धांत पैमाने के प्रतिफल का सिद्धांत कहलाता है क्योंकि दीर्घकाल में उत्पादन का कोई भी साधन स्थिर नहीं रहता अतः फर्म अपने उत्पादन के पैमाने में विस्तार भी कर सकती है और संकुचन भी।
 अर्थात जब उत्पत्ति के सभी साधनों में एक निश्चित अनुपात में वृद्धि करके उत्पादन को बढ़ाया जाता है तो इसे दीर्घकालीन उत्पादन फलन कहते हैं।
अगर पूँजी की मात्रा को दुगुना किया गया है तो श्रम की मात्रा को भी दुगुना करना होगा अर्थात साधनों के परिवर्तन का अनुपात स्थिर रहता है। उदाहरण :
 
     50x = f ( 2L, 4K ) 
   500x = f ( 20L, 40K ) 
   पहले उत्पादन फलन से स्पष्ट है कि x वस्तु की 50 इकाइयों के उत्पादन में श्रम की 2 तथा पूँजी की 4 इकाइयों का उपयोग हुआ है और दूसरा उत्पादन फलन बता रहा है कि उत्पादन की मात्रा में दस गुना वृद्धि के लिए श्रम और पूँजी की इकाईयों में दस - दस गुना वृद्धि की गई है अर्थात श्रम की इकाईयों को 2 से बढ़ाकर 20 किया गया है वहीं पूँजी की इकाईयों को 4 से बढ़ाकर 40 किया गया है। इसी तरह एक और उदाहरण है – 

   100x = f ( 10L, 5K ) 
 1000x = f ( 50L, 25K ) 
यहाँ भी उत्पादन के साधनों की इकाईयों में पाँच - पाँच गुना वृद्धि की गई है जो कि समान अनुपात है और उत्पादन की मात्रा में दस गुना वृद्धि हुई है। 
              पैमाने के प्रतिफल 
          Returns to Scale 
पैमाने के प्रतिफल से तात्पर्य उत्पादन में आने वाले उस बदलाव से है जो उत्पत्ति के सभी कारकों को समान अनुपात में परिवर्तित करने की वजह से आता है। उत्पत्ति के सभी कारकों में परिवर्तन सिर्फ़ दीर्घ काल में ही सम्भव है इसलिए पैमाने के प्रतिफल का संबंध दीर्घकालीन उत्पादन फलन से होता है। 
पैमाने के प्रतिफल के विभिन्न नियम 
Different Types of Returns to Scale 
     साधनों के अनुपात में होने वाले परिवर्तन से उत्पादन की मात्रा में  परिवर्तन की तुलना करने से पता चलता है कि उत्पादन में परिवर्तन किस अनुपात में हो रहा है। उत्पादन में परिवर्तन तीन प्रकार से हो सकता है –  
   उत्पादन के साधनों की इकाइयों में वृद्धि की अपेक्षा उत्पादन अधिक अनुपात में  भी बढ़ सकता है, समान अनुपात में भी बढ़ सकता है और ये भी मुमकिन है कि उत्पादन के साधनों की इकाइयों में जितनी वृद्धि की जाये उसके मुक़ाबले में उत्पादन कम बढ़े। 
उत्पादन तकनीक में सुधार, विशिष्टीकरण आदि के कारण उत्पादन में आन्तरिक एवं बाह्य बचत होती हैं लेकिन ये बचतें अस्थायी होती हैं जो कुछ समय बाद हानियों में बदल जाती हैं। 
   उत्पादन के आरंभिक दिनों में इन आन्तरिक एवं बाह्य बचतों की वजह से ही पैमाने के बढ़ते प्रतिफल(Increasing Returns to Scale ) प्राप्त होते हैं। जब ये बचतें हानि में बदल जाती हैं तो पैमाने के ह्रासमान अथवा घटते हुए प्रतिफल(Decreasing Returns to Scale ) प्राप्त होते हैं। इनके मध्य की अवस्था पैमाने के स्थिर या समान प्रतिफल(Constant Returns to Scale) की होती है। 
स्पष्ट है कि पैमाने के प्रतिफल को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –

1) पैमाने के बढ़ते प्रतिफल (Increasing Returns to Scale )

2) पैमाने के स्थिर या समान प्रतिफल(Constant Returns to Scale) 

3) पैमाने के ह्रासमान अथवा घटते हुए प्रतिफल(Decreasing Returns to Scale )

    पैमाने के बढ़ते प्रतिफल 
Increasing Returns to Scale

जब साधनों की निश्चित वृद्धि से क्रमश: अधिक  उत्पादन प्राप्त होता है तो इसे पैमाने के बढ़ते प्रतिफल कहते
हैं। यदि उत्पादन के साधनों को 20% बढ़ाया जाए और उत्पादन 20% से ज़्यादा बढ़ जाए तो यह  अवस्था पैमाने के बढ़ते प्रतिफल की है। इस तरह पैमाने के बढ़ते प्रतिफल में - 
उत्पादन में आनुपातिक वृद्धि > साधनों की मात्रा में आनुपातिक वृद्धि
  


 इस रेखाचित्र में  समोत्पाद वक्र (Iso-Product Curve) IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ द्वारा पैमाने के बढ़ते प्रतिफल को दर्शाया गया है ये चारों वक्र उत्पादन में समान वृद्धि (100 इकाइयों) को दर्शा रहे हैं। OS रेेखा उत्पादन के पैमाने (scale) को दर्शा रही है। समोत्पाद वक्र IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ पैमाना रेखा OS को क्रमशः P, Q, R एवं T बिन्दु पर काट रहे हैं और इन सभी बिन्दुओं पर क्रमशः 100,200,300 तथा 400 इकाईयों का उत्पादन दर्शाया गया है। 
रेखाचित्र में OP>PQ>QR>RT 
अर्थात उत्पादन में समान वृद्धि  (100 इकाइयों) के लिए दोनों साधनों A और B की क्रमशः कम मात्रा की आवश्यकता होगी। यही पैमाने के बढ़ते प्रतिफल का नियम है। 

    पैमाने के स्थिर या समान प्रतिफल
   Constant Returns to Scale
 
इस नियम के अनुसार जिस अनुपात में उत्पत्ति के साधनों की मात्रा को बढ़ाया जाएगा उत्पादन में भी उसी अनुपात में वृद्धि होगी और जिस अनुपात में उत्पत्ति के साधनों की मात्रा में कमी होगी उत्पादन भी उसी अनुपात में घटेगा । यदि उत्पत्ति के साधनों को 40% बढ़ाया जाये और उत्पादन भी 40% ही बढ़े तो यह अवस्था पैमाने के स्थिर या समान प्रतिफल की है। इस तरह पैमाने के स्थिर प्रतिफल में - 
 उत्पादन में आनुपातिक वृद्धि = साधनों में आनुपातिक वृद्धि
 

इस रेखाचित्र में समोत्पाद वक्र (Iso-Product Curve) IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ द्वारा पैमाने के स्थिर प्रतिफल को दर्शाया गया है ये चारों वक्र उत्पादन में समान वृद्धि (100 इकाइयों) को दर्शा रहे हैं। OS रेेखा उत्पादन के पैमाने (scale) को दर्शा रही है। समोत्पाद वक्र IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ पैमाना रेखा OS को क्रमशः P, Q, R एवं T बिंदुओं पर समान टुकड़ों में बाँट रहे हैं और इन सभी बिन्दुओं पर क्रमशः 100,200,300 तथा 400 इकाईयों का उत्पादन दर्शाया गया है। 
रेखाचित्र में OP=PQ=QR=RT 
अर्थात उत्पादन में समान वृद्धि (100 इकाइयों) के लिए दोनों साधनों A और B की क्रमशः समान मात्रा की आवश्यकता होगी। यही पैमाने के स्थिर प्रतिफल का नियम है। 

पैमाने के ह्रासमान या घटते हुए प्रतिफल
Decreasing Returns to Scale 

इस नियम के अनुसार जिस अनुपात में उत्पत्ति के साधनों में वृद्धि होगी उत्पादन उससे कम अनुपात में बढ़ेगा । यदि साधनों को 20% बढ़ाया जाये और उत्पादन में 20% से कम वृद्धि हो तो यह अवस्था पैमाने के घटते प्रतिफल की है। अन्य शब्दों में, उत्पादन में समान वृद्धि के लिए साधनों की क्रमश: अधिकाधिक मात्रा की आवश्यकता होगी। इस तरह पैमाने के घटते प्रतिफल में - 
उत्पादन में आनुपातिक वृद्धि < साधनों में आनुपातिक वृद्धि

  


इस रेखाचित्र में समोत्पाद वक्र (Iso-Product Curve) IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ द्वारा पैमाने के घटते प्रतिफल को दर्शाया गया है ये चारों वक्र उत्पादन में समान वृद्धि (100 इकाइयों) को दर्शा रहे हैं। OS रेेखा उत्पादन के पैमाने (scale) को दर्शा रही है। समोत्पाद वक्र IP₁ , IP₂ , IP₃ और IP₄ पैमाना रेखा OS को क्रमशः P, Q, R एवं T बिंदुओं पर काट रहे हैं और इन सभी बिन्दुओं पर क्रमशः 100,200,300 तथा 400 इकाईयों का उत्पादन दर्शाया गया है। 
रेखाचित्र में PQ<QR<RT 
अर्थात उत्पादन में समान वृद्धि (100 इकाइयों) के लिए दोनों साधनों A और B की क्रमशः अधिक मात्रा की आवश्यकता होगी। यही पैमाने के घटते प्रतिफल का नियम है।

पैमाने के प्रतिफल की तीन अवस्थाएँ ज़रूर होती हैं लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि पैमाने के तीनों प्रतिफल को दर्शाने के लिए अलग-अलग उत्पादन फलन की आवश्यकता होती है। अक्सर एक ही उत्पादन फलन पैमाने के प्रतिफल की तीनों अवस्थाओं की व्याख्या करता है।
जब एक फर्म अपने उत्पादन के पैमाने को बढ़ाती है तो पैमाने के  बढ़ते प्रतिफल की अवस्था प्राप्त होती है फिर एक स्थिति पैमाने के  स्थिर प्रतिफल की आती है और आख़िर में पैमाने के घटते प्रतिफल की अवस्था प्राप्त होती है। पैमाने पैमाने के प्रतिफल की तीनों अवस्थाओं को समोत्पाद वक्रों (IP curves) की मदद से एक ही रेखाचित्र में आसानी से समझा जा सकता है  -
  



 इस रेखाचित्र में OS पैमाने रेखा को तीन हिस्सों में बांट सकते हैं – 

i) बिन्दु P से बिन्दु S तक
     PQ >  QR > RS  
 रेखा का ये भाग पैमाने के बढ़ते प्रतिफल को दिखा रहा है।

ii) बिन्दु S से बिन्दु K तक
       ST = TK
रेखा का ये भाग पैमाने के स्थिर प्रतिफल को दिखा रहा है।

iii) बिन्दु K से बिन्दु V तक
        KM < MN < NV
रेखा का ये भाग पैमाने के घटते प्रतिफल को दिखा रहा है।

    पैमाने के प्रतिफल की मान्यताएं
 पैमाने के प्रतिफल के संबंध में निम्नलिखित तथ्य अथवा मान्यताएं हैं –

1)  ये दीर्घकालीन उत्पादन फलन पर आधारित होते हैं क्योंकि इसका संबंध दीर्घकालीन उत्पादन से होता है ।

2) पूर्ण प्रतियोगिता होती है। उत्पादन के सभी साधनों की इकाईयों को एक समान अनुपात में परिवर्तित किया जा सकता है। 

3) वस्तु या उत्पादन को उसकी मात्रा द्वारा मापा जाता है मुद्रा में नहीं। 

4) उत्पादन की तकनीक अर्थात प्रौद्योगिकी में कोई भी परिवर्तन नहीं आता है ।